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नज़्म
तुम को आख़िर मेरे उन के दरमियाँ आने से क्या
मोहसिन-ए-मन वो समझ जाएँगे समझाने से क्या
नख़्शब जार्चवि
नज़्म
दोस्त मिला था तुझ को कैसा हैफ़ इतना भी याद नहीं
जान फ़िदा करता था जिस पर दिल में उस की याद नहीं