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नज़्म
अख़्तर शीरानी
नज़्म
हाँ बे-कल बे-कल रहता है हो पीत में जिस ने जी हारा
पर शाम से ले कर सुब्ह तलक यूँ कौन फिरेगा आवारा
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
कोई जबीं न तिरे संग-ए-आस्ताँ पे झुके
कि जिंस-ए-इज्ज़-ओ-अक़ीदत से तुझ को शाद करे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
रहा करता है अहल-ए-ग़म को क्या क्या इंतिज़ार इस का
कि देखें वो दिल-ए-नाशाद को कब शाद करते हैं
राम प्रसाद बिस्मिल
नज़्म
مرا عيش غم ،مرا شہد سم ، مري بود ہم نفس عدم
ترا دل حرم، گرو عجم ترا ديں خريدہ کافري
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हर गाली, मिस्री, क़ंद-भरी, हर एक क़दम अटखेली का
दिल शाद किया और मोह लिया ये, जौबन पाया होली ने
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
फिर भी अनजाने में जब शहर की राहों में कहीं
देख लेता हूँ मैं दोशीज़ा जमालों के हुजूम