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नज़्म
यादों के बे-म'अनी दफ़्तर ख़्वाबों के अफ़्सुर्दा शहाब
सब के सब ख़ामोश ज़बाँ से कहते हैं ऐ ख़ाना-ख़राब
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
तू और रंग-ए-ग़ाज़ा-ओ-गुलगूना-ओ-शहाब
सोचा भी किस के ख़ून की बनती हैं सुर्ख़ियाँ
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
क्यूँ टिमटिमाए किर्मक-ए-शब-ताब की तरह
बन सकता है तू औज-ए-फ़लक पर अगर शहाब
सय्यद वहीदुद्दीन सलीम
नज़्म
रस्ता ये जाना-पहचाना है कभी कभी ये अपना होता था
बरसों बरस तक इन पथ पर प्यार हमारा संजोता था
शहाब जाफ़री
नज़्म
जैसे पेशानी-ए-मशरिक़ पे हो सुब्ह-ए-काज़िब
जैसे तारीक ख़लाओं में शहाब-ए-साक़िब
मसूद मैकश मुरादाबादी
नज़्म
दिल पे 'शहाब' कितने चुभते हैं देखो नश्तर
सब खेल वक़्त का है सब वक़्त के हैं मंज़र