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नज़्म
जो मूड हो तो सुनाएँ नामा ठुमक ठुमक कर बजाएँ तबला
गए वो इक रोज़ छत के ऊपर वहाँ चचा ने पतंग उड़ाई
अब्दुल क़ादिर
नज़्म
ज़ह्न की चादरें तुम्हारे मूड से बदली जाती हैं
निय्यत का मौसम यक-दम मोनाल की रात बन जाता है
फ़ातिमा मेहरू
नज़्म
किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो
हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों