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नज़्म
इक गर्म अँगीठी जलती हो और शम्अ हो रौशन और तिस पर
वो दिलबर, शोख़, परी, चंचल, है धूम मची जिस की घर घर
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
या जंगल के अंधेरे में जादू की अँगूठी दमकी है
साबुन की भीनी ख़ुश्बू से महक गया दालान
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
प्रीत नगर से फेरी वाला मेरी गली में आया
चूड़ी, लौंग, अँगूठी, छल्ले रंग बिरंगे लाया
सज्जाद बाक़र रिज़वी
नज़्म
ऐ ख़्वाब-ए-ख़ंदा मिरी अँगेठी का ख़्वाब बन जा
कि शब का आहन पिघलने तक मेरी चिमनियों के धुएँ में