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नज़्म
करती हैं सर ग़ुरूर का नीचे उतार कर
पस्ती का सर बुलंद भी करती हैं सीढ़ियाँ
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
नज़्म
या तो आज़ादी से 'साबिर' हो हमारा सर बुलंद
या हमारे सर को ज़ेब-ए-दार होना चाहिए
सरदार नौबहार सिंह साबिर टोहानी
नज़्म
अब संग-ओ-ख़िश्त ओ ख़ाक ओ ख़ज़फ़ सर-बुलंद हैं
ताज-ए-वतन का लाल-ए-दरख़्शाँ चला गया