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नज़्म
तआ'रुफ़ रोग हो जाए तो उस का भूलना बेहतर
त'अल्लुक़ बोझ बन जाए तो उस को तोड़ना अच्छा
साहिर लुधियानवी
नज़्म
क्यूँ जी पर बोझ उठाता है इन गौनों भारी भारी के
जब मौत का डेरा आन पड़ा फिर दूने हैं ब्योपारी के
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
वो इक ऐसी आग है जिस को सिर्फ़ दहकने से मतलब है
वो इक ऐसा फूल है जिस पर अपनी ख़ुशबू बोझ बनी है