aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम ".ebro"
सितारे जो दमकते हैंकिसी की चश्म-ए-हैराँ मेंमुलाक़ातें जो होती हैंजमाल-ए-अब्र-ओ-बाराँ मेंये ना-आबाद वक़्तों मेंदिल-ए-नाशाद में होगीमोहब्बत अब नहीं होगीये कुछ दिन बा'द में होगीगुज़र जाएँगे जब ये दिनये उन की याद में होगी
और यूँ कहीं भी रंज-ओ-बला से मफ़र नहींक्या होगा दो घड़ी में किसी को ख़बर नहींअक्सर रियाज़ करते हैं फूलों पे बाग़बाँहै दिन की धूप रात की शबनम उन्हें गिराँलेकिन जो रंग बाग़ बदलता है ना-गहाँवो गुल हज़ार पर्दों में जाते हैं राएगाँरखते हैं जो 'अज़ीज़ उन्हें अपनी जाँ की तरहमिलते हैं दस्त-ए-यास वो बर्ग-ए-ख़िज़ाँ की तरहलेकिन जो फूल खिलते हैं सहरा में बे-शुमारमौक़ूफ़ कुछ रियाज़ पे उन की नहीं बहारदेखो ये क़ुदरत-ए-चमन-आरा-ए-रोज़गारवो अब्र-ओ-बाद ओ बर्फ़ में रहते हैं बरक़रारहोता है उन पे फ़ज़्ल जो रब्ब-ए-करीम कामौज-ए-सुमूम बनती है झोंका नसीम काअपनी निगाह है करम-ए-कारसाज़ परसहरा चमन बनेगा वो है मेहरबाँ अगरजंगल हो या पहाड़ सफ़र हो कि हो हज़ररहता नहीं वो हाल से बंदे के बे-ख़बरउस का करम शरीक अगर है तो ग़म नहींदामान-ए-दश्त दामन-ए-मादर से कम नहीं
कभी कभी दिल ये सोचता हैन जाने हम बे-यक़ीन लोगों को नाम-ए-हैदर से रब्त क्यूँ हैहकीम जाने वो कैसी हिकमत से आश्ना थाशजीअ जाने कि बदर ओ ख़ैबर की फ़त्ह-मंदी का राज़ क्या थाअलीम जाने वो इल्म के कौन से सफ़ीनों का ना-ख़ुदा थामुझे तो बस सिर्फ़ ये ख़बर हैवो मेरे मौला की ख़ुशबुओं में रचा-बसा थावो उन के दामान-ए-आतिफ़त में पला बढ़ा थाऔर उस के दिन रात मेरे आक़ा के चश्म ओ अबरू ओ जुम्बिश-ए-लब के मुंतज़िर थेवो रात को दुश्मनों के नर्ग़े में सो रहा था तो उन की ख़ातिरजिदाल में सर से पाँव तक सुर्ख़ हो रहा था तो उन की ख़ातिरसो उस को महबूब जानता हूँसो उस को मक़्सूद मानता हूँसआदतें उस के नाम से हैंमोहब्बतें उस के नाम से हैंमोहब्बतों के सभी घरानों की निस्बतें उस के नाम से हैं
बस्ती से थोड़ी दूर चट्टानों के दरमियाँठहरा हुआ है ख़ाना-ब-दोशों का कारवाँउन की कहीं ज़मीन न उन का कहीं मकाँफिरते हैं यूँही शाम ओ सहर ज़ेर-ए-आसमाँधूप और अब्र-ओ-बार के मारे हुए ग़रीबये लोग वो हैं जिन को ग़ुलामी नहीं नसीब
नई जगह थी दूर दूर तक आख़िर पर दीवारें शब कीकुछ यारों ने बरपा कर दी इक महफ़िल कुछ अपने ढब कीऊँचे दर से दाख़िल हो कर साफ़ नशेब में बैठे जा करएक मक़ाम में हुए इकट्ठे रौनक़ और वीरानी आ करमरकज़-ए-दर से जश्न-बपा तक सैर थी शाम-ए-मेहर-ओ-वफ़ा कीख़ुशी थी उस से मिलने जैसी बेचैनी थी अब्र-ओ-हवा कीसब रंगों के लोग जम्अ थे एक ही मंज़िल थी उन सब कीइक बस्ती आलाम से ख़ाली एक फ़ज़ा किसी ख़्वाब-ए-तरब कीजंगल की शादाबी जैसा पहना था कोई जल्वा उस नेपैराहन इक नई वज़्अ का खुले समुंदर जैसा उस नेकर रक्खा था चेहरा अपना दुख-मुख से बे-परवा उस नेमेरी तरफ़ तकने से पहले चारों जानिब देखा उस ने
नज़्र-ए-वतन फिर ऐ दिल दीवाना चाहिएफिर हर क़दम पे सज्दा-ए-शुकराना चाहिएफिर सर-ज़मीं वतन की है नज़रों के सामनेफिर लब पे एक नारा-ए-मस्ताना चाहिएबचपन की याद लेती है फिर दिल में चुटकियाँफिर बे-ख़ुदी ब-हुज्जत-ए-तिफ़्लाना चाहिएबरसों के बा'द आए हैं बाग़-ए-वतन में हमफिर हर कली को सजदा-ए-मस्ताना चाहिएकोहसार सब्ज़-पोश नज़र आए दूर सेफिर लब पे चार बैत का अफ़्साना चाहिएजिस कूचे में हुईं कभी रुस्वाइयाँ नसीबउस का तवाफ़ बा-दिल-ए-दीवाना चाहिएबख़्शा था जिस ने पहले-पहल दिल को दर्द-ए-इश्क़फिर उस के दर पे सज्दा-ए-शुकराना चाहिएफिर दिल को हो यक़ीं न किसी के विसाल काफिर वाक़िआ' ब-सूरत-ए-अफ़्साना चाहिएफिर शौक़ से मिलेंगे किसी गुल-एज़ार सेफिर लब पे शोर-ए-बुलबुल-ए-मस्ताना चाहिएझूला झुलाएंगे किसी मस्त-ए-शबाब कोरक़्साँ फ़ज़ा में फिर मय-ओ-मय-ख़ाना चाहिएपाए तलब को वादी-ए-परवीं है नीम-गामफिर आरज़ू को मंज़िल-ए-जानाना चाहिएफिर ख़िर्मन सुकूँ को हैं दरकार बिजलियाँफिर बे-हिजाब जल्वा-ए-जानाना चाहिएफिर ज़ौक़-ए-मय-कशी को है मेराज की तलबकौसर का बादा चाँद का पैमाना चाहिएफिर शौक़ बन के दिल में धड़कती है ज़िंदगीफिर जुम्बिश-ए-तबस्सुम-ए-जानाना चाहिएफिर सीना-ए-उमीद में रक़्साँ है बर्क़-ए-तूरफिर पुर्सिश मज़ाक़ कलीमाना चाहिएबाला-ए-कोह साया-ए-अब्र-ए-बहार मेंपरवीन-ओ-माहताब का काशाना चाहिएफिर उस हरीम-ए-नूर के आग़ोश-ए-नाज़ मेंइक गुल-कदा ब-रंग-ए-परी-ख़ाना चाहिएफिर अब्र-ओ-बाग़-ओ-निकहत-ओ-गुल के हुजूम मेंशम्अ' ओ सर्व ओ बादा-ओ-पैमाना चाहिएफिर उस की चश्म-ए-मस्त पे गेसू हों पुर-फ़िशाँफिर अब्र-ए-शाम-गूँ सर-ए-मय-ख़ाना चाहिएफिर चाँदनी में दामन-ए-दरिया ये ऐ नदीमरक़्स-ए-शराब-ओ-गर्दिश-ए-पैमाना चाहिएजोश-ए-तरब ने हश्र सा दिल में किया बपाफिर बे-ख़ुदी को गिरिया-ए-मस्ताना चाहिए'अख़्तर' वतन में आ के खुला है ये हुस्न-ए-राज़इस मुख़्तसर सी उम्र में क्या क्या न चाहिए
मुझे शाम आई है शहर मेंजहाँ आसमाँ की वुसअ'तों सेसवाल कासा-ब-दस्त लौटे थेयाद हैशब हीला जो तुझे याद हैवो सलीबजिस पे मचान नज्म-ए-सहर की थीवो ख़तीबजिस का ख़िताब अबरू हुआ से थावो सदा-ए-ज़ब्त अजीब थीकहीं कोढ़ियों की शिफ़ा बनीकहीं अब्र-ओ-बाद सेचोब-ए-ख़ुश्क तड़ख़ रही थी सवेर सेबड़ी देर से यहाँ मरक़दों के गुलाबपाँव की धूल हैंमैं सफ़र में हूँमुझे शाम आई है शहर मेंमिरे हाथ में भी कमान हैमुझे तीर दे
ये बादलों का तनफ़्फ़ुस ये सर्द सर्द हवाये सनसनाती हवाएँ ये बोलते हुए साज़किसे ख़बर थी कि तुझ को पुकारते ऐ दोस्तइन्ही फ़ज़ाओं में खो जाएगी मिरी आवाज़
हुस्न है मौजूद हर जा चश्म-ए-बीना चाहिएदीदा-ए-दिल खोल कर हाँ उस को देखा चाहिएउस का जल्वा है अयाँ गुल-हा-ए-रंगा-रंग सेसब्ज़े में शाख़ों में घर उस ने किया सौ ढंग सेजागुज़ीँ है रात दिन ये बहर-ओ-बर के देस मेंशहर में आता है ये लाल-ओ-गुहर के भेस मेंहुस्न-ए-क़ुदरत मुनहसिर कुछ छोटी चीज़ों पर नहींबल्कि ये जल्वा-नुमा है हर जहाँ में हर कहींकोह-ओ-राग़-ओ-अब्र-ओ-बाद-ओ-महर-ओ-मह जिन्न-ओ-बशरनूर-ए-हुस्न-ए-हक़ से हैं ये सब मुनव्वर सर-बसरहै जहाँ सारा मुनव्वर और मंदर हुस्न कादेखिए जो घर नज़र आता है वो घर हुस्न काआश्ना हैं जो वजूद-ए-हुस्न-ए-क़ुदरत से वो सबजानते हैं आप को महसूर-ए-नूर-ए-हुस्न-ए-रबदिल अगर दाना बुवद दर हर-सुख़न असरार हस्तचश्म गर बीना बुवद यूसुफ़ ब-हर-बाज़ार हस्त
जब कभी भी फ़ुर्सत होमय-कदे में आ जाओहम यहाँ फ़रिश्तों कोआदमी बनाते हैंमौसम-ए-बहाराँ होया फ़स्ल-ए-अब्र-ओ-बाराँ होधूप चिलचिलाती होया हवा हो बर्फ़ीलीसाथ हम-सफ़र ले करशोख़ हो या शर्मीलीजब कभी भी फ़ुर्सत होमय-कदे में आ जाओहम यहाँ फ़रिश्तों कोआदमी बनाते हैंभूल कर भी वो बस्तीजिस जगह सियासत होभूल कर भी वो नगरीजिस जगह जहालत होलाख तुम को दें दावतभूल कर भी मत जानाहाँ अगर मिले फ़ुर्सतमय-कदे में आ जानाहम यहाँ फ़रिश्तों कोआदमी बनाते हैंसीख अक़्ल की बातेंछोड़ सब ख़ुराफ़ातेंझूट और नफ़रत सेकब तलक गुज़र होगीबात सब से कर सीधीप्यार और मोहब्बत कीजब ख़ुशी मिले उस सेजश्न ही मनाने कोमय-कदे में आ जानाहम यहाँ फ़रिश्तों कोआदमी बनाते हैंज़ेहन गर परेशाँ होनींद गर नहीं आतीहुस्न और जवानी भीगर तुझे नहीं भातीगर नशे की आदत हैऔर वो नहीं जातीसुन तो ग़ौर से भाईक्यों बना है बलवाईगर तुझे शिकायत हैबेवफ़ा ज़माने सेग़म ग़लत ही करने कोमय-कदे में आ जाओहम यहाँ फ़रिश्तों कोआदमी बनाते हैं
ये तंगन-ए-क़फ़स ये सियासत-ए-सय्यादये आब-ओ-गिल के तलातुम यह वुसअ'त-ए-बर्बादये तीरगी ये दिल-ए-मेहर-ओ-माह की धड़कनये आँसूओं के सितारे ये इस्मतों के कफ़नये भीगती हुई पलकें ये टूटते हुए दिलये रेग-ज़ार-ए-हक़ीक़त ये पर्दा-ए-महमिलये चीख़ती हुई रूहें ये हसरतों के सनमये बज़्म-ए-कुफ़्र-ओ-यक़ीं ये जहान-ए-दैर-ओ-हरमये शोर-ए-हश्र ये पैकार-ए-सुब्हा-ओ-ज़ुन्नारये जाँ-गुदाज़ फ़ज़ाएँ ये रूह-सोज़ बहारये आंधियों की क़तारें ये कारवान-ए-हयातन पूछ कितने शगूफ़े हैं मरकज़-ए-आफ़ातसवाद-ए-ज़ीस्त में तूफ़ान आए हैं क्या क्याचराग़-ए-सिद्क़-ओ-सफ़ा झिलमिलाए हैं क्या क्याअयाग़ छूट पड़े मय-कशों के हाथों सेअयाँ दिलों की सियाही है कितने हाथों सेनिगल चुकी शब-ए-ग़म किन सहर-शिकारों कोकि ज़लज़लों ने जगाया है फ़ित्ना-ज़ारों कोहयात मर्ग-ए-मोहब्बत पे नौहा-ख़्वाँ है अभीवही फ़साना-ए-इफ़्लास जाँ-सिताँ है अभीउदास-उदास सी रातें थके-थके से नुजूमये अब्र-ओ-बाद की यूरिश ये बिजलियों का हुजूमये तीरा बज़्म-ए-जहाँ ये शिकस्त-ए-क़ल्ब-ओ-नज़रमहल बनाए हैं क़ारूनियों ने लाशों परदिलों पे यास के होते रहे सितम क्या क्याकराहते रहे ज़ुल्फ़ों के पेच-ओ-ख़म क्या क्यादयार-ए-शौक़ में गूँजे हैं मरसिए कितनेबुझा गई है नसीम-ए-सहर दिए कितनेवही सदाक़त-ओ-एहसास के जनाज़े हैंइज़ार-ए-गंग-ओ-जमन पर लहू के ग़ाज़े हैंवही ख़ुदा हैं वही बुत वही रसूल अभीसमनिस्ताँ में हैं बाक़ी ख़िज़ाँ के फूल अभीचमन हज़ार सुमूम-ए-ख़िज़ाँ से खेले हैंमगर हनूज़ वही बेबसी के मेले हैं
ख़ौफ़ अभी जुड़ा न था सिलसिला-ए-कलाम सेहर्फ़ अभी बुझे न थे दहशत-ए-कम-ख़िराम सेसंग-ए-मलाल के लिए दिल आस्ताँ हुआ न थाइक़्लीम-ए-ख़्वाब में कहीं कोई ज़ियाँ हुआ न थानिकहत-ए-अब्र-ओ-बाद की मस्ती में डोलते थे घरसाफ़ दिखाई देते थेउस की गली के सब शजरगर्द मिसाल-ए-दस्तकें दर पे अभी जमी न थींरंग-ए-फ़िराक़-ओ-वस्ल की परतें अभी खुली न थींऐसे में थी किसे ख़बरजब साअत-ए-माहताब होयूँ भी तो है कि और ही नक़्शा-ए-ख़ाक-ओ-आब हो
कश्तियों की तरह गाँव बहते रहेऔर क़ुदरत का हर वार सहते रहेअब्र-ओ-बाराँ के साए में रहते रहेबेवफ़ा मेरी मौजों को कहते रहे
उस ने कहासुनअहद निभाने की ख़ातिर मत आनाअहद निभाने वाले अक्सरमजबूरी या महजूरी की थकन से लौटा करते हैंतुम जाओऔर दरिया दरिया प्यास बुझाओजिन आँखों में डूबोजिस दिल में उतरोमेरी तलब आवाज़ न देगीलेकिन जब मेरी चाहतऔर मिरी ख़्वाहिश की लौइतनी तेज़ और इतनीऊँची हो जाएजब दिल रो देतब लौट आना
फ़लक का तुझे शामियाना दियाज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया
कोई अब्र उड़े किसी क़ुल्ज़ुम से रस बरसे मिरे वीराने परकोई जागता हो कोई कुढ़ता हो मिरे देर से वापस आने परकोई साँस भरे मिरे पहलू में कोई हाथ धरे मिरे शाने पर
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबीउफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबीउरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ासमझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबीमुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब नेतलातुम-हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबीअता मोमिन को फिर दरगाह-ए-हक़ से होने वाला हैशिकोह-ए-तुर्कमानी ज़ेहन हिन्दी नुत्क़ आराबीअसर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुलनवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबीतड़प सेहन-ए-चमन में आशियाँ में शाख़-सारों मेंजुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर-ए-सीमाबीवो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखेनज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबीज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर देचमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर देसरिश्क-ए-चश्म-ए-मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदाख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदाकिताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी हैये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदारबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रासबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदाअगर उस्मानियों पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म हैकि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदाजहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनीजिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदाहज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती हैबड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदानवा-पैरा हो ऐ बुलबुल कि हो तेरे तरन्नुम सेकबूतर के तन-ए-नाज़ुक में शाहीं का जिगर पैदातिरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िंदगी कह देमुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी कह देख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू हैयक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू हैपरे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ कीसितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो हैमकाँ फ़ानी मकीं फ़ानी अज़ल तेरा अबद तेराख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है तू जावेदाँ तू हैहिना-बंद-ए-उरूस-ए-लाला है ख़ून-ए-जिगर तेरातिरी निस्बत बराहीमी है मेमार-ए-जहाँ तू हैतिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात-ए-ज़िंदगानी कीजहाँ के जौहर-ए-मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो हैजहान-ए-आब-ओ-गिल से आलम-ए-जावेद की ख़ातिरनबुव्वत साथ जिस को ले गई वो अरमुग़ाँ तू हैये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदाकि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू हैसबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअ'त कालिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत कायही मक़्सूद-ए-फ़ितरत है यही रम्ज़-ए-मुसलमानीउख़ुव्वत की जहाँगीरी मोहब्बत की फ़रावानीबुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जान तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानीमियान-ए-शाख़-साराँ सोहबत-ए-मुर्ग़-ए-चमन कब तकतिरे बाज़ू में है परवाज़-ए-शाहीन-ए-क़हस्तानीगुमाँ-आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द-ए-मुसलमाँ काबयाबाँ की शब-ए-तारीक में क़िंदील-ए-रुहबानीमिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस नेवो क्या था ज़ोर-ए-हैदर फ़क़्र-ए-बू-ज़र सिद्क़-ए-सलमानीहुए अहरार-ए-मिल्लत जादा-पैमा किस तजम्मुल सेतमाशाई शिगाफ़-ए-दर से हैं सदियों के ज़िंदानीसबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया मेंकि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानीजब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदातो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदाग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरेंजो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरेंकोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू कानिगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरेंविलायत पादशाही इल्म-ए-अशिया की जहाँगीरीये सब क्या हैं फ़क़त इक नुक्ता-ए-ईमाँ की तफ़्सीरेंबराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती हैहवस छुप छुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरेंतमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत हैहज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरेंहक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी होलहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरेंयक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलमजिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरेंचे बायद मर्द रा तब-ए-बुलंद मशरब-ए-नाबेदिल-ए-गरमे निगाह-ए-पाक-बीने जान-ए-बेताबेउक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकलेसितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकलेहुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वालेतमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकलेग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकलेहमारा नर्म-रौ क़ासिद पयाम-ए-ज़िंदगी लायाख़बर देती थीं जिन को बिजलियाँ वो बे-ख़बर निकलेहरम रुस्वा हुआ पीर-ए-हरम की कम-निगाही सेजवानान-ए-ततारी किस क़दर साहब-नज़र निकलेज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकलेजहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैंइधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकलेयक़ीं अफ़राद का सरमाया-ए-तामीर-ए-मिल्लत हैयही क़ुव्वत है जो सूरत-गर-ए-तक़दीर-ए-मिल्लत हैतू राज़-ए-कुन-फ़काँ है अपनी आँखों पर अयाँ हो जाख़ुदी का राज़-दाँ हो जा ख़ुदा का तर्जुमाँ हो जाहवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौ-ए-इंसाँ कोउख़ुव्वत का बयाँ हो जा मोहब्बत की ज़बाँ हो जाये हिन्दी वो ख़ुरासानी ये अफ़्ग़ानी वो तूरानीतू ऐ शर्मिंदा-ए-साहिल उछल कर बे-कराँ हो जाग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरेतू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जाख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी हैनिकल कर हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जामसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा करशबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जागुज़र जा बन के सैल-ए-तुंद-रौ कोह ओ बयाबाँ सेगुलिस्ताँ राह में आए तो जू-ए-नग़्मा-ख़्वाँ हो जातिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोईनहीं है तुझ से बढ़ कर साज़-ए-फ़ितरत में नवा कोईअभी तक आदमी सैद-ए-ज़बून-ए-शहरयारी हैक़यामत है कि इंसाँ नौ-ए-इंसाँ का शिकारी हैनज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब-ए-हाज़िर कीये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा-कारी हैवो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब कोहवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी हैतदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकताजहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी हैअमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भीये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी हैख़रोश-आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर देकि तू इस गुल्सिताँ के वास्ते बाद-ए-बहारी हैफिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत कीज़मीं जौलाँ-गह-ए-अतलस क़बायान-ए-तातारी हैबया पैदा ख़रीदा रास्त जान-ए-ना-वान-ए-रापस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर्मा कारवाने राबया साक़ी नवा-ए-मुर्ग़-ज़ार अज़ शाख़-सार आमदबहार आमद निगार आमद निगार आमद क़रार आमदकशीद अब्र-ए-बहारी ख़ेमा अंदर वादी ओ सहरासदा-ए-आबशाराँ अज़ फ़राज़-ए-कोह-सार आमदसरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ीकि ख़ैल-ए-नग़्मा-पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमदकनार अज़ ज़ाहिदाँ बर-गीर ओ बेबाकाना साग़र-कशपस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़-ए-कुहन बाँग-ए-हज़ार आमदब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवरतसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमददिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्ददब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमदसर-ए-ख़ाक-ए-शाहीरे बर्ग-हा-ए-लाला मी पाशमकि ख़ूनश बा-निहाल-ए-मिल्लत-ए-मा साज़गार आमदबया ता-गुल बा-अफ़ोशनीम ओ मय दर साग़र अंदाज़ेमफ़लक रा सक़्फ़ ब-शागाफ़ेम ओ तरह-ए-दीगर अंदाज़ेम
ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही होकि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही होये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ूशगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसूनशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरूतमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादूहज़ारों जादू जगा रही होये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
हुआ ख़ेमा-ज़न कारवान-ए-बहारइरम बन गया दामन-ए-कोह-सारगुल ओ नर्गिस ओ सोसन ओ नस्तरनशहीद-ए-अज़ल लाला-ख़ूनीं कफ़नजहाँ छुप गया पर्दा-ए-रंग मेंलहू की है गर्दिश रग-ए-संग मेंफ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूरठहरते नहीं आशियाँ में तुयूरवो जू-ए-कोहिस्ताँ उचकती हुईअटकती लचकती सरकती हुईउछलती फिसलती सँभलती हुईबड़े पेच खा कर निकलती हुईरुके जब तो सिल चीर देती है येपहाड़ों के दिल चीर देती है येज़रा देख ऐ साक़ी-ए-लाला-फ़ामसुनाती है ये ज़िंदगी का पयामपिला दे मुझे वो मय-ए-पर्दा-सोज़कि आती नहीं फ़स्ल-ए-गुल रोज़ रोज़वो मय जिस से रौशन ज़मीर-ए-हयातवो मय जिस से है मस्ती-ए-काएनातवो मय जिस में है सोज़-ओ-साज़-ए-अज़लवो मय जिस से खुलता है राज़-ए-अज़लउठा साक़िया पर्दा इस राज़ सेलड़ा दे ममूले को शहबाज़ सेज़माने के अंदाज़ बदले गएनया राग है साज़ बदले गएहुआ इस तरह फ़ाश राज़-ए-फ़रंगकि हैरत में है शीशा-बाज़-ए-फ़रंगपुरानी सियासत-गरी ख़्वार हैज़मीं मीर ओ सुल्ताँ से बे-ज़ार हैगया दौर-ए-सरमाया-दारी गयातमाशा दिखा कर मदारी गयागिराँ ख़्वाब चीनी सँभलने लगेहिमाला के चश्मे उबलने लगेदिल-ए-तूर-ए-सीना-ओ-फ़ारान दो-नीमतजल्ली का फिर मुंतज़िर है कलीममुसलमाँ है तौहीद में गरम-जोशमगर दिल अभी तक है ज़ुन्नार-पोशतमद्दुन तसव्वुफ़ शरीअत-ए-कलामबुतान-ए-अजम के पुजारी तमामहक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गईये उम्मत रिवायात में खो गईलुभाता है दिल को कलाम-ए-ख़तीबमगर लज़्ज़त-ए-शौक़ से बे-नसीबबयाँ इस का मंतिक़ से सुलझा हुआलुग़त के बखेड़ों में उलझा हुआवो सूफ़ी कि था ख़िदमत-ए-हक़ में मर्दमोहब्बत में यकता हमीयत में फ़र्दअजम के ख़यालात में खो गयाये सालिक मक़ामात में खो गयाबुझी इश्क़ की आग अंधेर हैमुसलमाँ नहीं राख का ढेर हैशराब-ए-कुहन फिर पिला साक़ियावही जाम गर्दिश में ला साक़ियामुझे इश्क़ के पर लगा कर उड़ामिरी ख़ाक जुगनू बना कर उड़ाख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद करजवानों को पीरों का उस्ताद करहरी शाख़-ए-मिल्लत तिरे नम से हैनफ़स इस बदन में तिरे दम से हैतड़पने फड़कने की तौफ़ीक़ देदिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ देजिगर से वही तीर फिर पार करतमन्ना को सीनों में बेदार करतिरे आसमानों के तारों की ख़ैरज़मीनों के शब ज़िंदा-दारों की ख़ैरजवानों को सोज़-ए-जिगर बख़्श देमिरा इश्क़ मेरी नज़र बख़्श देमिरी नाव गिर्दाब से पार करये साबित है तो इस को सय्यार करबता मुझ को असरार-ए-मर्ग-ओ-हयातकि तेरी निगाहों में है काएनातमिरे दीदा-ए-तर की बे-ख़्वाबियाँमिरे दिल की पोशीदा बेताबियाँमिरे नाला-ए-नीम-शब का नियाज़मिरी ख़ल्वत ओ अंजुमन का गुदाज़उमंगें मिरी आरज़ूएँ मिरीउम्मीदें मिरी जुस्तुजुएँ मिरीमिरी फ़ितरत आईना-ए-रोज़गारग़ज़ालान-ए-अफ़्कार का मुर्ग़-ज़ारमिरा दिल मिरी रज़्म-गाह-ए-हयातगुमानों के लश्कर यक़ीं का सबातयही कुछ है साक़ी मता-ए-फ़क़ीरइसी से फ़क़ीरी में हूँ मैं अमीरमिरे क़ाफ़िले में लुटा दे इसेलुटा दे ठिकाने लगा दे इसेदमा-दम रवाँ है यम-ए-ज़िंदगीहर इक शय से पैदा रम-ए-ज़िंदगीइसी से हुई है बदन की नुमूदकि शो'ले में पोशीदा है मौज-ए-दूदगिराँ गरचे है सोहबत-ए-आब-ओ-गिलख़ुश आई इसे मेहनत-ए-आब-ओ-गिलये साबित भी है और सय्यार भीअनासिर के फंदों से बे-ज़ार भीये वहदत है कसरत में हर दम असीरमगर हर कहीं बे-चुगों बे-नज़ीरये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-शश-जिहातइसी ने तराशा है ये सोमनातपसंद इस को तकरार की ख़ू नहींकि तू मैं नहीं और मैं तू नहींमन ओ तू से है अंजुमन-आफ़रींमगर ऐन-ए-महफ़िल में ख़ल्वत-नशींचमक उस की बिजली में तारे में हैये चाँदी में सोने में पारे में हैउसी के बयाबाँ उसी के बबूलउसी के हैं काँटे उसी के हैं फूलकहीं उस की ताक़त से कोहसार चूरकहीं उस के फंदे में जिब्रील ओ हूरकहीं जज़ा है शाहीन सीमाब रंगलहू से चकोरों के आलूदा चंगकबूतर कहीं आशियाने से दूरफड़कता हुआ जाल में ना-सुबूरफ़रेब-ए-नज़र है सुकून ओ सबाततड़पता है हर ज़र्रा-ए-काएनातठहरता नहीं कारवान-ए-वजूदकि हर लहज़ है ताज़ा शान-ए-वजूदसमझता है तू राज़ है ज़िंदगीफ़क़त ज़ौक़-ए-परवाज़ है ज़िंदगीबहुत उस ने देखे हैं पस्त ओ बुलंदसफ़र उस को मंज़िल से बढ़ कर पसंदसफ़र ज़िंदगी के लिए बर्ग ओ साज़सफ़र है हक़ीक़त हज़र है मजाज़उलझ कर सुलझने में लज़्ज़त उसेतड़पने फड़कने में राहत उसेहुआ जब उसे सामना मौत काकठिन था बड़ा थामना मौत काउतर कर जहान-ए-मकाफ़ात मेंरही ज़िंदगी मौत की घात मेंमज़ाक़-ए-दुई से बनी ज़ौज ज़ौजउठी दश्त ओ कोहसार से फ़ौज फ़ौजगुल इस शाख़ से टूटते भी रहेइसी शाख़ से फूटते भी रहेसमझते हैं नादाँ उसे बे-सबातउभरता है मिट मिट के नक़्श-ए-हयातबड़ी तेज़ जौलाँ बड़ी ज़ूद-रसअज़ल से अबद तक रम-ए-यक-नफ़सज़माना कि ज़ंजीर-ए-अय्याम हैदमों के उलट-फेर का नाम हैये मौज-ए-नफ़स क्या है तलवार हैख़ुदी क्या है तलवार की धार हैख़ुदी क्या है राज़-दरून-हयातख़ुदी क्या है बेदारी-ए-काएनातख़ुदी जल्वा बदमस्त ओ ख़ल्वत-पसंदसमुंदर है इक बूँद पानी में बंदअँधेरे उजाले में है ताबनाकमन ओ तू में पैदा मन ओ तू से पाकअज़ल उस के पीछे अबद सामनेन हद उस के पीछे न हद सामनेज़माने के दरिया में बहती हुईसितम उस की मौजों के सहती हुईतजस्सुस की राहें बदलती हुईदमा-दम निगाहें बदलती हुईसुबुक उस के हाथों में संग-ए-गिराँपहाड़ उस की ज़र्बों से रेग-ए-रवाँसफ़र उस का अंजाम ओ आग़ाज़ हैयही उस की तक़्वीम का राज़ हैकिरन चाँद में है शरर संग मेंये बे-रंग है डूब कर रंग मेंइसे वास्ता क्या कम-ओ-बेश सेनशेब ओ फ़राज़ ओ पस-ओ-पेश सेअज़ल से है ये कशमकश में असीरहुई ख़ाक-ए-आदम में सूरत-पज़ीरख़ुदी का नशेमन तिरे दिल में हैफ़लक जिस तरह आँख के तिल में हैख़ुदी के निगहबाँ को है ज़हर-नाबवो नाँ जिस से जाती रहे उस की आबवही नाँ है उस के लिए अर्जुमंदरहे जिस से दुनिया में गर्दन बुलंदख़ुदी फ़ाल-ए-महमूद से दरगुज़रख़ुदी पर निगह रख अयाज़ी न करवही सज्दा है लाइक़-ए-एहतिमामकि हो जिस से हर सज्दा तुझ पर हरामये आलम ये हंगामा-ए-रंग-ओ-सौतये आलम कि है ज़ेर-ए-फ़रमान-ए-मौतये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-चश्म-ओ-गोशजहाँ ज़िंदगी है फ़क़त ख़ुर्द ओ नोशख़ुदी की ये है मंज़िल-ए-अव्वलींमुसाफ़िर ये तेरा नशेमन नहींतिरी आग इस ख़ाक-दाँ से नहींजहाँ तुझ से है तू जहाँ से नहींबढ़े जा ये कोह-ए-गिराँ तोड़ करतिलिस्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ तोड़ करख़ुदी शेर-ए-मौला जहाँ उस का सैदज़मीं उस की सैद आसमाँ उस का सैदजहाँ और भी हैं अभी बे-नुमूदकि ख़ाली नहीं है ज़मीर-ए-वजूदहर इक मुंतज़िर तेरी यलग़ार कातिरी शौख़ी-ए-फ़िक्र-ओ-किरदार काये है मक़्सद गर्दिश-ए-रोज़गारकि तेरी ख़ुदी तुझ पे हो आश्कारतू है फ़ातह-ए-आलम-ए-ख़ूब-ओ-ज़िश्ततुझे क्या बताऊँ तिरी सरनविश्तहक़ीक़त पे है जामा-ए-हर्फ़-ए-तंगहक़ीक़त है आईना-ए-गुफ़्तार-ए-ज़ंगफ़रोज़ाँ है सीने में शम-ए-नफ़समगर ताब-ए-गुफ़्तार रखती है बसअगर यक-सर-ए-मू-ए-बरतर परमफ़रोग़-ए-तजल्ली ब-सोज़द परम
ये चाँद बीते ज़मानों का आइना होगाभटकते अब्र में चेहरा कोई बना होगा
Devoted to the preservation & promotion of Urdu
A Trilingual Treasure of Urdu Words
Online Treasure of Sufi and Sant Poetry
World of Hindi language and literature
The best way to learn Urdu online
Best of Urdu & Hindi Books