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नज़्म
शब-ए-ज़फ़ाफ़-ए-अबू-लहब थी मगर ख़ुदाया वो कैसी शब थी
अबू-लहब की दुल्हन जब आई तो सर पे ईंधन गले में
नून मीम राशिद
नज़्म
ज़ेर-ए-मेहराब आ गई हो उस को बेदारी की रात
ख़ुद जनाब-ए-इज़्ज़-ओ-जल से जैसे उमीद-ए-ज़फ़ाफ़
नून मीम राशिद
नज़्म
सर-ब-सर इक मुज़्दा-ए-तसकीन-ए-मरदान-ए-ज़ईफ़
क़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-यारान-ए-जवाँ पैदा हुआ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
टूटे हाथों की हड्डियों से वो दोहल-ए-बातिल को पीटते थे
ज़ईफ़ कव्वों ने अहल-ए-क़र्या की क़ब्रें खोदीं
अली अकबर नातिक़
नज़्म
मुस्लिम से तनफ़्फ़ुर और कुफ़्फ़ार से याराना
आख़िर ये क़ला-बाज़ी क्यूँ खा गए मौलाना
ज़रीफ़ लखनवी
नज़्म
चंद दिन गर और चलता वो ज़माना अपनी चाल
हम को कर देती ज़ईफ़-उल-ए'तिक़ादी पाएमाल
जगत मोहन लाल रवाँ
नज़्म
क्या जाने उस ज़रीफ़ के क्या दिल में आई थी
कर्फ़्यू में जिस ने महफ़िल-ए-शेरी सजाई थी
खालिद इरफ़ान
नज़्म
चलो हम ऐसा करते हैं
ज़ईफ़-ओ-तिफ़्ल को बहू को बेटियों को माँ को हम मुश्तरका कहते हैं
अबु बक्र अब्बाद
नज़्म
मय-कदा है यहाँ सामान-ए-मसर्रत हैं ज़रीफ़'
आ भी जाओ मियाँ बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर होली में