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नज़्म
ग़रज़ वो हुस्न अब इस रह का जुज़्व-ए-मंज़र है
नियाज़-ए-इश्क़ को इक सज्दा-गह मयस्सर है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
कहती हैं कोई मुझ को जोड़ा सोहा बना दो
या टाट बाफ़ी जूता या कफ़्श-ए-सुर्ख़ ला दो
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
हल्की टोपी सर पे रखते हैं तो चकराता है सर
और जूते की तरफ़ बढ़िए तो झुक जाता है सर
जोश मलीहाबादी
नज़्म
धूप में लहरा रही है काकुल-ए-अम्बर-सरिश्त
हो रहा है कम-सिनी का लोच जुज़्व-ए-संग-ओ-ख़िश्त
जोश मलीहाबादी
नज़्म
मियाँ बीवी चले बाज़ार को बहर-ए-ख़रीदारी
मिठाई फल सिवय्याँ इत्र जूते गोश्त तरकारी