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नज़्म
राहत हो या कि रंज ख़ुशी हो कि इंतिशार
वाजिब हर एक रंग में है शुक्र-ए-किर्दगार
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
इंतिहा की चिड़ है मुझ को दो दिलों के क़ुर्ब से
देखता हूँ जब ये फ़ौरन जाल फैलाता हूँ मैं
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
महीने में दो बार क़ीमा या मुर्ग़ी का सालन
छटी क्लास में पढ़ने वाले ग़बी छोटे भाई की टीयूशन