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नज़्म
तुम चाहो तो बस्ती छोड़े तुम चाहो तो दश्त बसाए
ऐ मतवालो नाक़ों वालो वर्ना इक दिन ये होगा
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
नुमूद-ए-सुब्ह से जब मुंतशिर हुई महफ़िल
अकेला रह गया शाएर ग़रीब-ए-शहर ओ ख़जिल