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नज़्म
'ग़सब'-ए-उजरत को दिया 'सरमाया' का जिस ने लक़ब
बे-हिसाब उस की बसीरत उस की मंतिक़ ला-जवाब
वामिक़ जौनपुरी
नज़्म
'ग़ालिब' ओ 'शेफ़्ता' ओ 'नय्यर' ओ 'आज़ुर्दा' ओ 'ज़ौक़'
अब दिखाएगा न शक्लों को ज़माना हरगिज़
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
ग़ालिब-ए-आतिश-नवा कुंज-ए-लहद में है ख़मोश
सोज़ से दिल के भरे नग़्मात में तासीर कौन
मुनीर वाहिदी
नज़्म
तेरी निगाह-ए-नाज़ से दोनों मुराद पा गए
अक़्ल, ग़याब ओ जुस्तुजू! इश्क़, हुज़ूर ओ इज़्तिराब!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
निगाह-ए-'ग़ालिब'-ओ-'इक़बाल' की गेती-शिकन मस्ती
सुरूर-ए-जुस्तजू मग़रिब की मतवाली हवाओं का
शफ़ीक़ फातिमा शेरा
नज़्म
हैं जितने अक़ारिब वो अक़ारिब से हैं बद-तर
अहबाब हैं वो ख़ुद-ग़रज़-ओ-ज़ूद-फ़रामोश