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नज़्म
सुना है आलम-ए-बाला में कोई कीमिया-गर था
सफ़ा थी जिस की ख़ाक-ए-पा में बढ़ कर साग़र-ए-जम से
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तितलियाँ अपने परों पर पा के क़ाबू हर तरफ़
सेहन-ए-गुलशन की रविश पर रक़्स फ़रमाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
मर्हबा ऐ ख़ाक-ए-पाक-ए-किश्वर-ए-हिन्दोस्ताँ
यादगार-ए-अहद-ए-माज़ी है तू ऐ जान-ए-जहाँ
सफ़ीर काकोरवी
नज़्म
जिस में जुज़ सनअत-ए-ख़ून-ए-सर-ए-पा कुछ भी न था
दिल को ताबीर कोई और गवारा ही न थी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जाम-ए-आतिश-ज़ेर-ए-पा की ओट ले कर साक़िया
बोतलों में डूब जाने का ज़माना आ गया