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नज़्म
हकीम जाने वो कैसी हिकमत से आश्ना था
शजीअ जाने कि बदर ओ ख़ैबर की फ़त्ह-मंदी का राज़ क्या था
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
इक मुसलसल गर्द में डूबे हुए सब बाम-ओ-दर
जिस तरफ़ देखो अंधेरा जिस तरफ़ देखो खंडर
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
कहीं दो उँगलियों से फ़ैसला होता है ख़ैबर का
कहीं बाज़ू कटाने से भी साहब कुछ नहीं होता
अदील ज़ैदी
नज़्म
सय्यद वहीदुद्दीन सलीम
नज़्म
कहीं दो उँगलियों से फ़ैसला होता है ख़ैबर का
कहीं बाज़ू कटाने से भी साहब कुछ नहीं होता
आदिल ज़ैदी
नज़्म
ले के इक चंगेज़ के हाथों से ख़ंजर तोड़ दूँ
ताज पर उस के दमकता है जो पत्थर तोड़ दूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
सिनान ओ गुर्ज़ ओ शमशीर ओ तबर ख़ंजर नहीं लाज़िम
बस इक एहसास लाज़िम है कि हम बुअदैन हैं दोनों