aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "KHidmat-e-urduu-e-mo.allaa"
छोटी सी बिल्लूछोटा सा बस्ताठूँसा है जिस मेंकाग़ज़ का दस्तालकड़ी का घोड़ारुई का भालूचूरन की शीशीआलू कचालूबिल्लू का बस्ताजिन की पिटारीजब इस को देखोपहले से भारीलट्टू भी इस मेंरस्सी भी इस मेंडंडा भी इस मेंगिल्ली भी इस मेंऐ प्यारी बिल्लूये तो बताओक्या काम करनेइस्कूल जाओउर्दू न जानोइंग्लिश न जानोकहती हो ख़ुद कोबिल्क़ीस बानोउम्र की इतनीकच्ची नहीं होछे साल की होबच्ची नहीं होबाहर निकालोलकड़ी का घोड़ाये लट्टू रस्सीये गिल्ली डंडागुड़िया के जूतेजंपर जुराबेंबस्ते में रक्खोअपनी किताबेंमुँह न बनाओइस्कूल जाओऐ प्यारी बिल्लूऐ प्यारी बिल्लू
ग़ज़लों के ऐ शहंशाह 'मीर'-ए-जहान-ए-उर्दूबाक़ी नहीं जहाँ में नाम-ओ-निशान-ए-उर्दूख़ून-ए-जिगर से तू ने जिस रेख़्ता को सींचाआलम में नज़्अ' के है मिलता नहीं मसीहाजिस बाग़ में पली थी उस में सभी ने मसलाजिस गुल्सिताँ की जाँ थी उस में भी अब है रुस्वाजिस की ज़बानों पर है कम ऐसे रह गए हैंबहवट में वक़्त ही की सब लोग बह गए हैंअहल-ए-ज़बाँ ने छोड़ा दानिश-वर उठ रहे हैंरुस्वाई है मुक़द्दर जिस सम्त भी गए हैंग़ज़लों के ऐ शहंशाह 'मीर'-ए-जहान-ए-उर्दूबाक़ी नहीं जहाँ में नाम-ओ-निशान-ए-उर्दू
ज़ौ-फ़िशाँ तू रहे ऐ शम्अ'-ए-ज़बान-ए-उर्दूतेरा हर ज़र्रा चमक कर मह-ए-कामिल हो जाएबोल-बाला हो तिरा मुल्क के हर गोशे मेंतेरी लौ ज़ेब-दह-ए-अंजुमन-ए-दिल हो जाएतेरी हर सत्र बने ज़ुल्फ़-ए-हसीनान-ए-जहाँइक ज़माना तिरा पाबंद-ए-सलासिल हो जाएजान दे हुस्न-ए-फ़साहत पे मसीहा-नफ़सीसामरी भी तिरे ए'जाज़ का क़ाइल हो जाएतेरे हर लफ़्ज़ में हो दर्द-ए-मोहब्बत की तड़पहर सुख़न शरह-ए-बयान-ए-ख़लिश-ए-दिल हो जाएहो गया में तिरे परवानों का हर साल हुजूमरोज़-अफ़्ज़ूँ तिरा हंगामा-ए-महफ़िल हो जाएहो कुछ इस तरह गुल-अफ़्शानी-ए-अर्बाब-ए-सुख़नजिस से पामाली-ए-गुलबाँग-ए-अनादिल हो जाएमय-ए-गुल-रंग-ए-शफ़क़ से रहे रंगीं तिरा जामतेरी हर बज़्म-ए-अदब मय-कदा-ए-दिल हो जाएहज़रत-ए-नूह का उठता रहे तूफ़ाँ यूँहीग़र्क़-ए-सैलाब-ए-सुख़न दामन-ए-साहिल हो जाएहर नौ-आमोज़ सिला पाए तिरी ख़िदमत काहर मह-ए-नौ तिरे सदक़े मह-ए-कामिल हो जाएज़हे तक़दीर ज़हे बख़्त कि नाचीज़ 'सरीर'तिरे ख़ुद्दाम की फ़िहरिस्त में शामिल हो जाए
सूना सूना सा है क्यूँ आज जहान-ए-उर्दूउठ गया कहते हैं इक पीर-ए-मुग़ान-ए-उर्दू
वतन की ख़िदमत-ए-बे-लौस है हर शख़्स पर लाज़िमयही वो काम है जो आदमी के काम आता हैलगा दी जाती है हुब्ब-ए-वतन में सर की बाज़ी भीइक ऐसा भी वुफ़ूर-ए-जोश में हंगाम आता हैपलटने ही को है क़िस्मत तुम्हारी ऐ वतन वालोतुम्हारे वास्ते ये अर्श से पैग़ाम आता हैग़ुलामी दूर होती है तुम्हारी अब कोई दम मेंहुकूमत और सरदारी का फिर हंगाम आता हैमुसीबत है ये बिल्कुल आरज़ी इस पर न घबरानाबस अब आता है अहद-ए-राहत-ओ-आराम आता हैवही फिर भी बज़्म होगी फिर वही रंगीनियाँ होंगीवही पैमाना आता है वही फिर जाम आता हैतुम अपनी ना-तवानी से परेशाँ इस क़दर क्यूँ होकभी कमज़ोर होना भी बशर के काम आता हैमिटा देता है दम में नख़वत-ए-नमरूद इक मच्छरकभी ऐसा भी दौर-ए-गर्दिश-ए-अय्याम आता हैख़ुदा-रा इस निज़ा-ए-बाहमी को ख़त्म फ़रमा दोज़रा सोचो कि तुम पर किस क़दर इल्ज़ाम आता हैकभी छिड़ता है गर मज़कूर, क़ौमों की जहालत कातो सब से पहले कानों में तुम्हारा नाम आता हैये नुक्ता याद रक्खो उस को भूला कह नहीं सकतेजो वक़्त-ए-सुब्ह जा कर, घर पे वक़्त-ए-शाम आता है
वतन की ख़िदमत-ए-बे-लौस है हर शख़्स पर लाज़िमयही वो काम है जो आदमी के काम आता हैलगा दी जाती है हुब्ब-ए-वतन में सर की बाज़ी भीइक ऐसा भी वुफ़ूर-ए-जोश में हंगाम आता हैपलटने ही को है क़िस्मत तुम्हारी ऐ वतन वालोतुम्हारे वास्ते ये अर्श से पैग़ाम आता हैग़ुलामी दूर होती है तुम्हारी अब कोई दम मेंहुकूमत और सरदारी का फिर हंगाम आता हैमुसीबत है ये बिल्कुल आरज़ी इस पर न घबरानाबस अब आता है अहद-ए-राहत-ओ-आराम आता हैवही फिर बज़्म होगी फिर वही रंगीनियाँ होंगीवही पैमाना आता है वही फिर जाम आता हैतुम अपनी ना-तवानी से परेशाँ इस क़दर क्यों होकभी कमज़ोर होना भी बशर के काम आता हैमिटा देता है दम में नख़वत-ए-नमरूद इक मच्छरकभी ऐसा भी दौर-ए-गर्दिश-ए-अय्याम आता हैख़ुदारा इस निज़ा-ए-बाहमी को ख़त्म फ़रमा दोज़रा सोचो कि तुम पर किस क़दर इल्ज़ाम आता हैकभी छिड़ता है गर मज़कूर क़ौमों की जहालत कातो सब से पहले कानों में तुम्हारा नाम आता हैये नुक्ता याद रक्खो उस को भूला कह नहीं सकतेजो वक़्त-ए-सुब्ह जा कर घर पे वक़्त-ए-शाम आता है
क्या जाने उस ज़रीफ़ के क्या दिल में आई थीकर्फ़्यू में जिस ने महफ़िल-ए-शेरी सजाई थीअल्लाह ऐसा ज़ौक़ जहन्नम में डाल देकर्फ़्यू में शाइरों को जो घर से निकाल देऐसे में जब कि शहर के सब रास्ते हों बंदसड़कों पे आ गए थे ये बा-ज़ौक़ शर-पसंदऐसे में जब कि घर से निकलना मुहाल थालेकिन ये शाइरों की अना का सवाल थाशेअरी-महाज़ ख़ाना-ए-शाएर से दूर थाकाबा में हाजियों को पहुँचना ज़रूर थाशाइर रवाँ थे शेर के चाक़ू लिए हुएदिल में ख़याल-ए-ख़िदमत-ए-उर्दू लिए हुएज़ोर-ए-क़लम के साथ सिपाह-ए-रियाज़ थीक़ानून हाथ में था बग़ल में बयाज़ थीगलियों में क़त्ल-ओ-ख़ूँ था सड़क पर फ़साद थाशाइर ब-ज़ोर-ए-फ़िक्र शरीक-ए-जिहाद थाकैसी निकल रही थी सदा गन-मशीन सेजैसे किसी को दाद मिले सामईन सेशाइर बयाज़ लाए थे संदूक़ की तरहमिसरे उगल रहे थे वो बंदूक़ की तरहजब फ़ाइरिंग अहल-ए-सुख़न की हुई तमामये ख़िदमत-ए-अदब का पुलिस ने सिला दियाकुछ शाइरों को रोड पे मुर्ग़ा बना दियाकुछ कोहना-मश्क़ भी थे सुजूद-ओ-रुकू मेंजबरन उन्हें पढ़ाया गया था शुरूअ' मेंतरही मुशाएरे का समाँ दे रहे थे वोइक मिस्रा-ए-तरह पे अज़ाँ दे रहे थे वोकुछ शाइरों को नग़्मा-सराई की फ़िक्र थीसद्र-ए-मुशाइरा को रिहाई की फ़िक्र थीजब शाइरों के हाथ शरीक-ए-दुआ हुएकर्फ़्यू का वक़्त ख़त्म हुआ तब रिहा हुएसब अपने अपने घर गए इस हाव-हू के बअ'दशाइर-अज़ीम होता है हर कर्फ़्यू के बअ'द
काश मैं एक पेड़ बन जातापेड़ बन कर जहाँ के काम आतारात दिन इक जगह खड़ा रहतागर्मी सर्दी की शिद्दतें सहताख़ूब बारिश में भीग जाता मगरशिकवा हरगिज़ न लाता मैं लब परधूप में लोग मेरे पास आतेमेरे साए में वो सुकूँ पातेछाँव में आ के बैठ जाते परिंदफूल फल पत्तियों से सब मेरीपूरी करते ज़रूरतें अपनीमैं किसी घर में ईंधन ही बनताया इमारत के काम में आताअल-ग़रज़ जिस तरह भी बन पड़ताख़िदमत-ए-ख़ल्क़ में लगा रहता
लुटे हुए क़दीम क़ाफ़िलों के मरसिए हो तुममिरी हर एक साँस में ग़ज़ल की इक किताब हैकुएँ के मेंडकोसुनोमिरी नज़र में गहरे नीले पानियों के ख़्वाब हैं
वो प्रेमचंद-मुंशी-ए-बे-मिस्ल-ओ-बे-बदलथी जिस के दम से बज़्म-ए-अदब में चहल-पहलअफ़्साने जिस के शम-ए-हिदायत थे बर-महलना-वक़्त आह हो गया वो लुक़्मा-ए-अजलइस सोज़-ए-जाँ-गुसिल से हर इक दिल कबाब हैफ़र्त-ए-तपिश है आतिश-ए-ग़म बे-हिसाब हैइल्मी शग़फ़ से उस के नहीं कौन बा-ख़बरहर क़ल्ब पर फ़साने हुए नक़्श कलहजरहै बहर-ए-इल्म तेरी रवानी से सर-बसरदामान-ओ-जेब-ए-उर्दू-ओ-हिन्दी हैं पुर-गुहरतर्ज़-ए-बयाँ हर एक का तू ने दिखा दियाधब्बा हर इक का अपने क़लम से मिटा दियाबज़्म-ए-अदब को ख़्वाब में भी ये न था ख़यालउन्नीस सौ छत्तीस का नहस होगा उस को सालअव्वल वफ़ात-ए-बर्क़ का उस को हुआ मलालफिर चल दिया जहान से ये मुंशी-बा-कमालनक़्श-ए-क़रार सैल-ए-फ़ना से मिटा है आजऐवान-ए-नज़्म-ओ-नस्र में मातम बपा है आजतुझ को प्रेमचंद ये शायद नहीं ख़बरकितना वफ़ात का तिरी दुनिया पे है असर'सूफ़ी' जहाँ में ढूँढती है उस को हर नज़रऐ माहताब-ए-इश्क़ बता तू छुपा किधरक्या शौक़ सामईं का फ़रामोश हो गयाअफ़्साना कहते कहते जो ख़ुद हाए सो गया
जब तक अदब-बरा-ए-अदब का रहा ख़यालअदबार-ओ-मुफ़लिसी से रहे हम शिकस्ता-हालसाए की तरह साथ नहूसत लगी रहीइक रोग बन के जान से उसरत लगी रहीगो शायरी का रंग निखरता चला गयाशीराज़ा-ए-मआश बिखरता चला गयालेकिन ख़ुदा भला करे इक मेहरबान काजिन को अदब-बरा-ए-शिकम का है तज्रबामौसूफ़ ने बताई हमें वो पते की बातअब दिन है रोज़-ए-ईद तो शब है शब-ए-बरातऑल इंडिया मुशाएरा मज्लिस के नाम सेखोला है इक इदारा-ए-नौ धूम-धाम सेकरते हैं शायरी के एवज़ अब मुशाएराइस रोज़गार से है हमें ख़ूब फ़ाएदाहर तीन चार माह के वक़्फ़े पे बे-ख़ललअपने प्रोग्रैम पे करते हैं हम अमलया'नी मुशाएरे का चलाते हैं कारोबारछपवा के रोज़-नामों में झूटा ये इश्तिहार'जोश'-ओ-'फ़िराक़'-ओ-'साहिर' ओ 'परवेज़' शाहिदी'फ़ैज़'-ओ-'ख़लील'-ओ-'जज़्बी' ओ 'मख़दूम'-ओ-'जाफ़री'कुर्सी-ओ-अर्श-ओ-लौह-ओ-क़लम सब ही आएँगेताज़ा कलाम अपनी ज़बाँ से सुनाएँगेइस इश्तिहार में वो कशिश है कि अहल-ए-ज़ौक़लेते हैं दाख़िले का टिकट दौड़ कर ब-शौक़सर्कस में जिस तरह से हो ख़िल्क़त का इज़्दिहामयूँही मुशाएरे में पहुँचते हैं ख़ास-ओ-आमसब लोग बैठ जाते हैं फ़र्श-ए-ज़मीं पे जबमाइक पे जा के करते हैं एलान हम ये तबअफ़सोस है कि आ न सके 'जोश' और 'फ़िराक़'ये मास्को रवाना हुए वो गए इराक़'जज़्बी' को इख़्तिलाज है 'परवेज़' हैं अलीलगाड़ी ज़रा सी चूक से मिस कर गए 'ख़लील'भेजी है 'फ़ैज़'-ओ-'साहिर'-ओ-'मख़दूम' ने ख़बरसीट उन को मिल सकी न हवाई जहाज़ परगो ये ख़बर दिलों को गुज़रती है नागवारहोना है जल्सा-गाह में थोड़ा सा इंतिशारले कर मगर ज़ेहानत-ए-फ़ितरी से काम हमदम-भर में सामईन को करते हैं राम हमडाइस पे तुक-फ़रोशों का रहता है इक हुजूमफ़िल्मी धुनों में गाने की जिन के बड़ी है धूमजो ख़ुद टिकट ख़रीद के आते हैं बज़्म मेंहम उन से अपना काम चलाते हैं बज़्म मेंले ले के गटकरी जो सुनाते हैं वो कलामउड़ते हैं वाह वाह के नारों से सक़्फ़-ओ-बामबज़्म-ए-नशात बनता है सारा मुशाएराहोता है कामयाब हमारा मुशाएराख़ुश-ख़ुश घरों को जाते हैं हुज़्ज़ार इक तरफ़नोटों का हम लगाते हैं अम्बार इक तरफ़ये ख़िदमत-ए-अदब का तरीक़ा है ला-जवाबपेशा ये वो है जिस में मुनाफ़ा' है बे-हिसाब
मुद्दतों सरकार-ए-देहली में रही ये बारयाबअब तक उर्दू-ए-मुअ'ल्ला है वही शाही ख़िताबदौर-दौरा लखनऊ में भी था क़ब्ल-अज़-इंक़लाबकर लिया था नुक्ता-संजों ने इसी को इंतिख़ाबहर अदा-शीरीं मज़ाक़-ए-पारसा-ओ-रिंद मेंउस का तूती बोलता था सब्ज़ा-ज़ार-ए-हिन्द में
कहें न क्यूँ ऐ क़वी तुझे हम ब-सिदक़-ए-दिल पासबान-ए-उर्दूबना है तेरी ही सई-ओ-काविश से सैफ़िया गुलसितान-ए-उर्दूनफ़स नफ़स में तिरे यक़ीनन बसी है बू-ए-ज़बान-ए-उर्दूतिरी नवा है नवा-ए-उर्दू तिरा बयाँ है बयान-ए-उर्दूदिखाईं भोपाल को तिरे ही जुनूँ ने जहद-ओ-अमल की राहेंवगर्ना मायूस हो चुके थे यहाँ के चारा-गरान-ए-उर्दूवजूद तेरा सभी के हक़ में है चशमा-ओ-आबशार-ओ-दरियाबुझाते हैं प्यास अपनी अपनी तुझी से सब तिश्नगान-ए-उर्दूइसे ज़माना-शनासी तेरी न हम कहेंगे तो क्या कहेंगेबना दिया 'सैफ़िया' को तू ने जो एक दारुल-अमान-ए-उर्दूतुझी से शहर-ए-ग़ज़ल को इक़्बालियात की मंज़िलें मिली हैंतिरे ही अज़्म-ओ-अमल से है गामज़न यहाँ कारवान-ए-उर्दूतिरा उजाला मिटा रहा है शब-ए-जहालत की तीरगी कोचमक रहा है तू बन के भोपाल में मह-ए-आसमान-ए-उर्दूखिलाए हैं शाख़ शाख़ तू ने यहाँ पे नुत्क़-ओ-नवा के ग़ुंचेग़लत नहीं है जो कह रहे हैं सभी तुझे ख़ुश-बयान-ए-उर्दूतिरे अज़ाएम की इस्तक़ामत पे सर-ब-कफ़ हैं हरीफ़ तेरेख़ुशा कि तेरे जवान हाथों में आज भी है कमान-ए-उर्दूसद-आफ़रीं तेरी हिम्मतों पर सद-आफ़रीं तेरी जुरअतों परसुनाई है बज़्म-ए-ग़ैर में तू ने बारहा दास्तान-ए-उर्दूये कम नहीं है कि मो'तरिफ़ है तिरी बसीरत का ये ज़मानारहा है सदहा ख़ुलूस-ए-दिल से तू शामिल-ए-आशिक़ान-ए-उर्दूरवाँ हैं तक़रीर और तहरीर से तिरी आगही के चश्मेतिरा क़लम है वक़ार-ए-उर्दू तिरी ज़बाँ तर्जुमान-ए-उर्दूमुजल्ला 'ग़ालिब' पे कर के शाए किया है बे-शक कमाल तू नेजहान-ए-इल्म-ओ-अदब के हक़ में है ख़ूब ये अरमुग़ान-ए-उर्दूनए नए गुल खिला रहा है अदब में तेरे क़लम का जादूतिरी फ़रासत के मो'तरिफ़ हैं तमाम-तर नुक्ता-दान-ए-उर्दूअगरचे राहों में तेरी हाइल हुए हैं दीवार बन के अक्सरमगर तिरे अज़्म-ओ-हौसला से ख़जिल हैं सब हासिदान-ए-उर्दूये तेरी कोशिश हिफ़ाज़तों की ये तेरा जज़्बा सलामती कान हो तो उर्दू को बेच खाएँ ज़रा में ये ताजिरान-ए-उर्दूमिसाल-ए-ख़ुरशीद तू ने बख़्शी है रौशनी जिन को इल्म-ओ-फ़न कीचमक रहे हैं अदब के गर्दूं पे बन के वो अख़्तरान-ए-उर्दूजो तेरे फ़न के अमीन बन कर फ़ज़ा-ए-आलम प छा गए हैंबड़ी अक़ीदत से देखते हैं तुझे वो शाइसतगान-ए-उर्दूउजाला करते रहेंगे यूँही चराग़ बन कर रह-ए-तलब मेंहर इक क़दम पर जो तू ने छोड़े हैं जगमगाते निशान-ए-उर्दूकहा है तू ने भी बारहा ख़ुद यहीं पली है यहीं बढ़ी हैकिसी ज़बाँ की हरीफ़ हरगिज़ यहाँ नहीं है ज़बान-ए-उर्दूतिरे जिहाद-ओ-अमल के सदक़े यक़ीन है ऐ क़वी ये हम कोइसी तरह तू बना रहेगा यहाँ सदा पासबान-ए-उर्दू
दबिस्तान-ए-उर्दू के गहरे समुंदर कीतह में से इक दिनमिरी नज़्म ग़ोता-ज़नों को मिलेगीवही नज़्म जो मैं ने तुम पर लिखी है
इक इक किताब इस की फूला-फला चमन हैगुलज़ार-ए-बे-ख़िज़ाँ है उर्दू ज़बाँ हमारी
होगी गवाह ख़ाक-ए-हिन्दोस्ताँ हमारीइस की कियारियों से फूटी ज़बाँ हमारीहिन्दू हों या मुसलमाँ ईसाई हों कि सिख होंउर्दू ज़बाँ के हम हैं उर्दू ज़बाँ हमारीमरना भी साथ इस के जीना भी साथ इस केहम इस के हैं मुहाफ़िज़ ये पासबाँ हमारी'ख़ुसरव' 'कबीर' 'तुलसी' 'ग़ालिब' की हैं अमानतक्या बे-निशान होगी प्यारी ज़बाँ हमारीक़ंद-ओ-नबात से है बढ़ कर मिठास इस कीहर दौर में रही है ये दिलसिताँ हमारीइस में टंके हुए हैं कितने हसीं सितारेक़ौमों की कहकशाँ है उर्दू ज़बाँ हमारीफिर चाहता है इस को दौर-ए-जहाँ मिटानाहोगी रक़म लहू से फिर दास्ताँ हमारीहैं जाँ से भी ज़ियादा हम को अज़ीज़ दोनोंहिन्दोस्ताँ हमारा उर्दू ज़बाँ हमारीवो भी तो एक दिन था हम मीर-ए-कारवाँ थेतक़लीद कर रहा था हर कारवाँ हमारीहम तो हर इक ज़बाँ को देते हैं प्यार अपनाफिर किस लिए मिटाए कोई ज़बाँ हमारीहम ज़ब्त की हदों से आगे निकल चुके हैंकब तक ये आज़माइश ऐ आसमाँ हमारी'एजाज़' मिल के गाएँ उर्दू का सब तरानागूँजे फ़ज़ा में हर-सू उर्दू ज़बाँ हमारी
न सियाही का समुंदर न फ़लक सा काग़ज़कैसे लिक्खे कोई तारीफ़-ए-ज़बान-ए-उर्दू
मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'अपने फ़न में बड़े हुश्यार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'आप का नाम असदुल्लाह था नौ-शाह लक़बमिर्ज़ा ग़ालिब से हुए बाद में मारूफ़-ए-अदबआज भी पढ़ के कलाम आप का हैरत में हैं सबज़ुल्फ़-ए-उर्दू में गिरफ़्तार थे मिर्ज़ा ग़ालिबमादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा ग़ालिबअकबराबाद में पैदा हुए देहली में रहेअहद-ए-तिफ़्ली ही से दुनिया के बड़े ज़ुल्म सहेअब भी हर अहल-ए-सुख़न आप को उस्ताद कहेसारे शोअ'रा के अलम-दार थे मिर्ज़ा ग़ालिबमादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'तंग-दस्ती में भी छोड़ा न वफ़ा का दामनमुफ़्लिसी में भी न अपनाए ख़ुशामद के चलनख़ून-ए-जज़बात से शादाब किया बाग़-ए-सुख़नफ़ितरतन शायर-ए-ख़ुद्दार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा ग़ालिबआप पर फ़ारसी शोअ'रा का भी था ख़ूब असरमसअला ख़िदमत-ए-उर्दू का भी था पेश-ए-नज़रअपने अशआ'र की अज़्मत से भी वाक़िफ़ थे मगर'मीर' जी के भी तरफ़-दार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'ख़त-नवीसी का दिया एक अनोखा अंदाज़गूँज उठी बज़्म-ए-अदब में ये निराली आवाज़आप मैदान-ए-सुख़न में भी थे सब से मुम्ताज़साथ ही इक बड़े नस्सार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'बे-नियाज़-ए-ग़म-ओ-आलाम हर इक फ़िक्र से दूरहो मुसीबत में भी रहते थे हमेशा मसरूरआज भी जिन के लतीफ़े हैं जहाँ में मशहूरमुस्कुराते हुए किरदार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
मेरे हर लफ़्ज़ में है कौसर-ओ-गंगा का लहूअदब-ओ-फ़न ही हैं बिखरे हुए मेरे गेसूचमन-ए-शर्क़ में रक़्सिंदा हैं मेरी ख़ुश्बूदौलत-ए-इल्म से आबाद है मेरा पहलू
चाशनी है ज़बान में जिन कीपासबाँ ये अमीर ख़ुसरौ के'मीर'-ओ-'ग़ालिब' के राज़दान-ए-सुख़नवारिसान-ए-ज़बान-ए-उर्दू हैंघोलते हैं मिठास बातों सेअपना लहजा हसीन रखते हैंएक तहज़ीब है सक़ाफ़त हैइस के खानों की अपनी लज़्ज़त हैऔर फिर हुस्न की तमाज़त हैदेखने वाले देखते हैं कहींइस के साहिल पे रौनक़-ए-दुनियाखेलती हँसती ग़ुल मचाती हुईमन-चले हँसते मुस्कुराते हुएज़िंदगी की ग़ज़ल सुनाते हुएरौनक़ों के असीर रहते हैंजिस को कहते थे लोग कोलाचीअब वो साहिल किनारे बस्ता शहरजाना जाता है शहर-ए-क़ाइद सेलोग जिस को कराची कहते हैं
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