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नज़्म
तबाही की हवा इस ख़ाक-ए-रंगीं तक न आई थी
ये वो ख़ित्ता था जिस में नौ-बहारों की ख़ुदाई थी
अख़्तर शीरानी
नज़्म
कहाँ ये नमरूद की ख़ुदाई!
तू जाल बुनता रहा है, जिन के शिकस्ता तारों से अपने मौहूम फ़लसफ़े के
नून मीम राशिद
नज़्म
मैं सोचता हूँ हक़ीक़त का ये तज़ाद है क्या
ख़ुदा जो देता है सब कुछ ख़ुदाई देता नहीं