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नज़्म
ख़्वाब-ए-गिराँ से ग़ुंचों की आँखें न खुल सकीं
गो शाख़-ए-गुल से नग़्मा बराबर उठा किया
आल-ए-अहमद सुरूर
नज़्म
वो दायरा रवाँ है जिस के हर सफ़र की इंतिहा
मक़ाम-ए-मर्ग-ए-ताज़गी मक़ाम-ए-मर्ग-ए-नग़्मगी
बलराज कोमल
नज़्म
वहीद अख़्तर
नज़्म
इस के दम से हम पे वाज़ेह उक़्दा-ए-मर्ग-ओ-हयात
इस के दम से हम पे रौशन है जहान-ए-काएनात
अता आबिदी
नज़्म
कुल्फ़त-ए-ज़ीस्त से इंसान परेशाँ ही सही
ज़ीस्त आशोब-ए-ग़म-ए-मर्ग का तूफ़ाँ ही सही