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नज़्म
ख़्वाब-ए-गिराँ से ग़ुंचों की आँखें न खुल सकीं
गो शाख़-ए-गुल से नग़्मा बराबर उठा किया
आल-ए-अहमद सुरूर
नज़्म
मक़ाम-ए-मर्ग-ए-ताज़गी मक़ाम-ए-मर्ग-ए-नग़्मगी
हवा नमी सफ़ेद धूप ज़र्द फूल देखते ही देखते गुज़र गए
बलराज कोमल
नज़्म
इस के दम से हम पे वाज़ेह उक़्दा-ए-मर्ग-ओ-हयात
इस के दम से हम पे रौशन है जहान-ए-काएनात