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नज़्म
मुझे तो बे-सुकूँ सा कर गया उस शोख़ का कहना
हक़ीक़त के तराज़ू में कभी तौला है जज़्बों को
मोहम्मद तन्वीरुज़्ज़मां
नज़्म
बाँस की कोंपलों की तरह रात की रात बढ़ती हुई लड़कियो
आइने के हर इक ज़ाविए से उलझती हुई लड़कियो
मोहम्मद अनवर ख़ालिद
नज़्म
हमें भी रो ले हुजूम-ए-गिर्या कि फिर न आएँगे ग़म के मौसम
हमें भी रो ले कि हम वही हैं
अली अकबर नातिक़
नज़्म
क़ल्ब ओ नज़र की ज़िंदगी दश्त में सुब्ह का समाँ
चश्मा-ए-आफ़्ताब से नूर की नद्दियाँ रवाँ!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
धीमी धीमी बहने वाली एक नहर-ए-दिल-नशीं
आब-ए-जू छोटी सी इक नाज़ुक ख़िराम-ओ-नाज़नीं