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नज़्म
सय्यद ज़मीर जाफ़री
नज़्म
''टेढ़ा लगा है क़त क़लम-ए-सरनविश्त को''
महँगाई में चला है ये बकरा बहिश्त को
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
बाहर किसी करम की बनावट में होंट एक ओंखा ठहरा ठहरा टेढ़ा ज़ाविया सा हैं
कोई मुझे अब पहचानेगा
मजीद अमजद
नज़्म
मैं सोचता हूँ क्या करूँ ऐसी बहिश्त को
''टेढ़ा लगा है क़त क़लम-ए-सरनविश्त को''
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
कि टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें बनी थीं कुछ जिस में
ये हर्फ़ थे जिन्हें मैं ने लिक्खा था पहले-पहल