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नज़्म
अपने गुलहा-ए-अक़ीदत पेश करती हूँ तुझे
मुख़्तसर ये है मोहब्बत पेश करती हूँ तुझे
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
तिरे लुत्फ़-ओ-अता की धूम सही महफ़िल महफ़िल
इक शख़्स था इंशा नाम-ए-मोहब्बत में कामिल
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
सवाद-ए-आग़ाज़-ए-ख़ुश्क-साली में क्यूँ वरक़ भीगने लगा है
धुआँ धुआँ शाम के अलाव में कोई जंगल जले
अख़्तर हुसैन जाफ़री
नज़्म
क्या अजब आग़ाज़-ए-हस्ती, क्या अजब आग़ाज़-ए-कार
जैसे वो ईसार-पेशा मर्द दाना-ओ-ग़मीं
मोहम्मद इज़हारुल हक़
नज़्म
ऐ कि तेरी ख़िदमतें सरमाया-दार-ए-इल्म हैं
तेरा मक़्सद ज़ीस्त का आग़ाज़-ए-ख़ुश-अंजाम है