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नज़्म
ये रुपहली छाँव ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफ़ी का तसव्वुर जैसे आशिक़ का ख़याल
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
ज़र्रात का बोसा लेने को सौ बार झुका आकाश यहाँ
ख़ुद आँख से हम ने देखी है बातिल की शिकस्त-ए-फ़ाश यहाँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
इक कूंज को सखियाँ छोड़ गईं आकाश की नीली राहों में
वो याद में तन्हा रोती थी, लिपटाए अपनी बाहोँ में
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
आकाश के तारे बुझते हैं धरती से धुआँ सा उठता है
दुनिया को ये लगता है जैसे सर से कोई साया उठता है
आनंद नारायण मुल्ला
नज़्म
उठ बैठे अंगड़ाई ले कर जो ग़फ़लत का मतवाला है
आकाश के तेवर कहते हैं, तूफ़ान फिर आने वाला है
जमील मज़हरी
नज़्म
धरती पे ये पानी सोने का आकाश पे नहरें चाँदी की
ये चाँद ये तारे ये दरिया मेरे लिए क्या है कुछ भी नहीं