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नज़्म
फ़ज़ा-ए-इल्म-ओ-फ़न पर ये मिसाल-ए-अब्र छाई है
मज़ाक़-ए-जुस्तुजू बन कर रग-ए-दिल में समाई है
अलम मुज़फ़्फ़र नगरी
नज़्म
हाल की ख़ातिर ख़िरद-कोशी है मुस्तसन मगर
बहर-ए-मुस्तक़बिल जुनून-ए-ज़ौक़-ए-बेदारी भी हो
अर्श मलसियानी
नज़्म
अब यहाँ मेरी गुज़र मुमकिन नहीं मुमकिन नहीं
किस क़दर ख़ामोश है ये आलम-ए-बे-काख़-ओ-कू
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तिरे माथे का टीका मर्द की क़िस्मत का तारा है
अगर तू साज़-ए-बेदारी उठा लेती तो अच्छा था