aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "aalimo.n"
रेडियो ने दस बजे शब के ख़बर दी ईद कीआलिमों ने रात भर इस न्यूज़ की तरदीद की
जहाँ हम लोग रहते हैंवहाँ अच्छे-भले लिखे-पढ़े ही लोग बस्ते हैंइमारत-ए-इल्म और दौलत की अज़्मत हुस्न को दो-बाला करती हैतबस्सुम मुस्कुराहट हाय-हेलो और ब-ज़ाहिर ख़ुश-दिली की बारिश होती हैकि जिस तेज़ी से याँ फैशन बदलता हैग़ुरूर-ए-हुस्न औरज़ेहन-ओ-दिल की साख़्त भी तब्दील होती हैरिज़ालत बुज़दिली और असबियत को याँउम्दा कपड़ों अच्छे चेहरों में छुपाते हैंमगर जब गाँव जाते हैंवहाँ के कच्चे घर खेतों में बाग़ों में ज़रा आराम करते हैंउछलते-कूदते बच्चों को आज़ादी से मर्द-ओ-ज़न को हँसते-बोलते जब देख आते हैंकि हर ग़म और ख़ुशी अच्छे बुरे हालात में वो सच्चे दिल से साथ रहते हैंन अपने ज़ाहिर-ओ-बातिन में कोई भेद रखते हैंजो नफ़रत है तो नफ़रत है मोहब्बत दिल से करते हैंकि मन में जो भी होता है ज़बाँ से साफ़ कहते हैंमगर फिर लौट कर जब शहर आते हैंअमीरों आलिमों और अफ़सरों के बीच रहते हैंतो ये महसूस होता हैकि हम बीमार हैं लाचार हैं तन्हा और क़ल्लाश हैंजहाँ हम लोग रहते हैंवहाँ सारे ही ऐसे लोग बस्ते हैं
साहब-ए-मुल्क-ए-इल्म मालिक-राममालिक-ए-मुल्क-ए-हिल्म मालिक-राममौलिद-ए-पाक फालिया की ज़मींहीर-ओ-रांझा की सर-ज़मीं के क़रींशहर-ए-गुजरात में रहे है ये मुक़ीमअर्ज़-ए-लाहौर में हुई ता'लीमनेकी-ओ-ख़ैर-ओ-ख़ल्क़ में फ़य्याज़दोस्ती के बहुत बड़े नब्बाज़कारवाँ कार-गाह-ए-हिकमत केला'ल इक मादन-ए-मोहब्बत केतलबा के शफ़ीक़-ओ-यावर हैंबहर तहक़ीक़ के शनावर हैंअकमल-ओ-अफ़ज़ल-ओ-अलीम-ओ-ख़तीबअकरम-ओ-आज़म-ओ-शरीफ़-ओ-नहीफ़साहिब-ए-फिक्र-ओ-बंदा-ए-दरवेशदोस्तों के बड़े अक़ीदे केशउन के मस्लक में बे-रियाई हैउन की रिंदी में पारसाई हैनस्र में उन की नज़्म की बू-बासनज़्म की इंतिहा के रम्ज़-शनासकिस क़दर आन-बान है उन कीबे-नियाज़ाना शान है उन कीअब भी चेहरे पे है शबाब का नूरसर-बसर इल्म की शराब का नूरबात करने में फूल झड़ते हैंकभी लड़ते न ये झगड़ते हैंइल्म की जुस्तुजू पे जान निसारबहर-ए-तहक़ीक़ रोज़-ओ-शब बेदारराह-ए-तहक़ीक़ पे चले हैं मुदामछान डाले इराक़-ओ-मिस्र-ओ-शामजर्मनी रूस बेल्जियम लंदनहर जगह देखे इल्म के मादनकारवाँ इल्म का है तेज़ ख़िरामऔर उस के अमीर मालिक-रामसाहब-ए-इल्म-ओ-साहब-ए-अख़लाक़दोस्ती में ये फ़र्द ख़ल्क़ में ताक़आश्ती और इल्म का इक गंजउन से पहुँचा नहीं किसी को रंजरम्ज़-दाँ हैं ये फ़िक्र-ए-ग़ालिब केहैं मुसन्निफ़ ये ज़िक्र-ए-ग़ालिब केमोहतरम दोस्त अर्श-ए-फ़र्शी केहैं मुरत्तब ये नज़र-ए-अर्शी केहैं ब-हर-रंग आलिमों के हबीबनज़र-ए-ज़ाकिर उन्हों ने दी तरतीबअरबी फ़ारसी हो या उर्दूउन की बातों में सब की है ख़ुश्बूउन की तसनीफ़ औरत और इस्लामपाएगी दहर में बक़ा-ए-दवामख़ूब लिखा तलामज़ा का हालख़ानदान-ए-असद का हुस्न मक़ालगुल-ए-रा'ना है नुस्ख़ा-ए-अर्तंगये भी बा-कैफ़ है गुल-ए-सद-रंगबरतना बम कि अरमुग़ाँ ब-दहमबस ग़नीमत कि क़ल्ब-ओ-जाँ ब-दहमइल्म रा दादा अज़ नज़र-ए-तम्कींरहनुमा-ए-ब-राह-ए-इल्म-ओ-यकींज़ेहन फ़र्ख़न्दा मग़्ज़ ताबिंदाबाद दर शहर-ए-इल्म पाइंदारो राज़-ए-हिर्स-ओ-आज़-ओ-तमा-ओ-हवसनेक-ख़ू नेक-क़ल्ब-ओ-नेक-नफ़सशहर-ए-ना-मुर्दमान-ओ-हद-ए-आज़ादबस हमें मर्द-अस्त ख़ुश-अतवारमुल्क-ए-मा'नी का बादशाह है येशहर-ए-इंशा का कज-कुलाह है येख़त्म है अर्श अब दुआ पे कलामये रहें बा-मुराद-ओ-शाद मुदामहुस्न-ए-सीरत की शम्अ' जलती रहेशाख़-ए-उम्मीद और फलती रहेज़िंदगी को मिले नशात तमामपुर हमेशा रहे सुरूर का जामनूर-ए-ख़ुर्शीद की तरह दमकेइल्म-ओ-तहक़ीक़ की ज़िया चमकेइल्म की रौशनी बढ़ाते रहेंहम को भी कुछ न कुछ सिखाते रहें
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबीउफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबीउरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ासमझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबीमुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब नेतलातुम-हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबीअता मोमिन को फिर दरगाह-ए-हक़ से होने वाला हैशिकोह-ए-तुर्कमानी ज़ेहन हिन्दी नुत्क़ आराबीअसर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुलनवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबीतड़प सेहन-ए-चमन में आशियाँ में शाख़-सारों मेंजुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर-ए-सीमाबीवो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखेनज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबीज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर देचमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर देसरिश्क-ए-चश्म-ए-मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदाख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदाकिताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी हैये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदारबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रासबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदाअगर उस्मानियों पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म हैकि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदाजहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनीजिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदाहज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती हैबड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदानवा-पैरा हो ऐ बुलबुल कि हो तेरे तरन्नुम सेकबूतर के तन-ए-नाज़ुक में शाहीं का जिगर पैदातिरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िंदगी कह देमुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी कह देख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू हैयक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू हैपरे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ कीसितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो हैमकाँ फ़ानी मकीं फ़ानी अज़ल तेरा अबद तेराख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है तू जावेदाँ तू हैहिना-बंद-ए-उरूस-ए-लाला है ख़ून-ए-जिगर तेरातिरी निस्बत बराहीमी है मेमार-ए-जहाँ तू हैतिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात-ए-ज़िंदगानी कीजहाँ के जौहर-ए-मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो हैजहान-ए-आब-ओ-गिल से आलम-ए-जावेद की ख़ातिरनबुव्वत साथ जिस को ले गई वो अरमुग़ाँ तू हैये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदाकि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू हैसबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअ'त कालिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत कायही मक़्सूद-ए-फ़ितरत है यही रम्ज़-ए-मुसलमानीउख़ुव्वत की जहाँगीरी मोहब्बत की फ़रावानीबुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जान तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानीमियान-ए-शाख़-साराँ सोहबत-ए-मुर्ग़-ए-चमन कब तकतिरे बाज़ू में है परवाज़-ए-शाहीन-ए-क़हस्तानीगुमाँ-आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द-ए-मुसलमाँ काबयाबाँ की शब-ए-तारीक में क़िंदील-ए-रुहबानीमिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस नेवो क्या था ज़ोर-ए-हैदर फ़क़्र-ए-बू-ज़र सिद्क़-ए-सलमानीहुए अहरार-ए-मिल्लत जादा-पैमा किस तजम्मुल सेतमाशाई शिगाफ़-ए-दर से हैं सदियों के ज़िंदानीसबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया मेंकि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानीजब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदातो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदाग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरेंजो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरेंकोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू कानिगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरेंविलायत पादशाही इल्म-ए-अशिया की जहाँगीरीये सब क्या हैं फ़क़त इक नुक्ता-ए-ईमाँ की तफ़्सीरेंबराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती हैहवस छुप छुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरेंतमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत हैहज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरेंहक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी होलहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरेंयक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलमजिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरेंचे बायद मर्द रा तब-ए-बुलंद मशरब-ए-नाबेदिल-ए-गरमे निगाह-ए-पाक-बीने जान-ए-बेताबेउक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकलेसितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकलेहुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वालेतमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकलेग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकलेहमारा नर्म-रौ क़ासिद पयाम-ए-ज़िंदगी लायाख़बर देती थीं जिन को बिजलियाँ वो बे-ख़बर निकलेहरम रुस्वा हुआ पीर-ए-हरम की कम-निगाही सेजवानान-ए-ततारी किस क़दर साहब-नज़र निकलेज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकलेजहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैंइधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकलेयक़ीं अफ़राद का सरमाया-ए-तामीर-ए-मिल्लत हैयही क़ुव्वत है जो सूरत-गर-ए-तक़दीर-ए-मिल्लत हैतू राज़-ए-कुन-फ़काँ है अपनी आँखों पर अयाँ हो जाख़ुदी का राज़-दाँ हो जा ख़ुदा का तर्जुमाँ हो जाहवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौ-ए-इंसाँ कोउख़ुव्वत का बयाँ हो जा मोहब्बत की ज़बाँ हो जाये हिन्दी वो ख़ुरासानी ये अफ़्ग़ानी वो तूरानीतू ऐ शर्मिंदा-ए-साहिल उछल कर बे-कराँ हो जाग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरेतू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जाख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी हैनिकल कर हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जामसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा करशबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जागुज़र जा बन के सैल-ए-तुंद-रौ कोह ओ बयाबाँ सेगुलिस्ताँ राह में आए तो जू-ए-नग़्मा-ख़्वाँ हो जातिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोईनहीं है तुझ से बढ़ कर साज़-ए-फ़ितरत में नवा कोईअभी तक आदमी सैद-ए-ज़बून-ए-शहरयारी हैक़यामत है कि इंसाँ नौ-ए-इंसाँ का शिकारी हैनज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब-ए-हाज़िर कीये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा-कारी हैवो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब कोहवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी हैतदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकताजहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी हैअमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भीये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी हैख़रोश-आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर देकि तू इस गुल्सिताँ के वास्ते बाद-ए-बहारी हैफिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत कीज़मीं जौलाँ-गह-ए-अतलस क़बायान-ए-तातारी हैबया पैदा ख़रीदा रास्त जान-ए-ना-वान-ए-रापस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर्मा कारवाने राबया साक़ी नवा-ए-मुर्ग़-ज़ार अज़ शाख़-सार आमदबहार आमद निगार आमद निगार आमद क़रार आमदकशीद अब्र-ए-बहारी ख़ेमा अंदर वादी ओ सहरासदा-ए-आबशाराँ अज़ फ़राज़-ए-कोह-सार आमदसरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ीकि ख़ैल-ए-नग़्मा-पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमदकनार अज़ ज़ाहिदाँ बर-गीर ओ बेबाकाना साग़र-कशपस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़-ए-कुहन बाँग-ए-हज़ार आमदब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवरतसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमददिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्ददब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमदसर-ए-ख़ाक-ए-शाहीरे बर्ग-हा-ए-लाला मी पाशमकि ख़ूनश बा-निहाल-ए-मिल्लत-ए-मा साज़गार आमदबया ता-गुल बा-अफ़ोशनीम ओ मय दर साग़र अंदाज़ेमफ़लक रा सक़्फ़ ब-शागाफ़ेम ओ तरह-ए-दीगर अंदाज़ेम
तुम अपने अक़ीदों के नेज़ेहर दिल में उतारे जाते होहम लोग मोहब्बत वाले हैंतुम ख़ंजर क्यूँ लहराते होइस शहर में नग़्मे बहने दोबस्ती में हमें भी रहने दोहम पालनहार हैं फूलों केहम ख़ुश्बू के रखवाले हैंतुम किस का लहू पीने आएहम प्यार सिखाने वाले हैंइस शहर में फिर क्या देखोगेजब हर्फ़ यहाँ मर जाएगाजब तेग़ पे लय कट जाएगीजब शेर सफ़र कर जाएगाजब क़त्ल हुआ सुर साज़ों काजब काल पड़ा आवाज़ों काजब शहर खंडर बन जाएगाफिर किस पर संग उठाओगेअपने चेहरे आईनों मेंजब देखोगे डर जाओगे
अपने माज़ी के तसव्वुर से हिरासाँ हूँ मैंअपने गुज़रे हुए अय्याम से नफ़रत है मुझेअपनी बे-कार तमन्नाओं पे शर्मिंदा हूँअपनी बे-सूद उमीदों पे नदामत है मुझे
ये फ़स्ल उमीदों की हमदमइस बार भी ग़ारत जाएगीसब मेहनत सुब्हों शामों कीअब के भी अकारत जाएगीखेती के कोनों-खुदरों मेंफिर अपने लहू की खाद भरोफिर मिट्टी सींचो अश्कों सेफिर अगली रुत की फ़िक्र करो
जहाँ-ज़ाद उस दौर में रोज़ हर रोज़वो साख्ता-बख़्त आ करमुझे देखती चाक पर पा-ब-गिल सर-ब-ज़ानूतो शानों से मुझ को हिलाती(वही चाक जो साल-हा-साल जीने का तन्हा सहारा रहा था)वो शानों से मुझ को हिलातीहसन कूज़ा-गर होश में आहसन अपने वीरान घर पर नज़र करये बच्चों के तन्नूर क्यूँकर भरेंगेहसन ऐ मोहब्बत के मारेमोहब्बत अमीरों की बाज़ीहसन अपने दीवार-ओ-दर पर नज़र करमेरे कान में ये नवा-ए-हज़ीं यूँ थी जैसेकिसी डूबते शख़्स को ज़ेर-ऐ-गिर्दाब कोई पुकारे!वो अश्कों के अम्बार फूलों के अम्बार थे हाँमगर मैं हसन कूज़ा-गर शहर-ऐ-औहाम के उनख़राबों का मज्ज़ूब था जिनमें कोई सदा कोई जुम्बिशकिसी मुर्ग़-ए-पर्रां का सायाकिसी ज़िंदगी का निशाँ तक नहीं था!
आ बताऊँ तुझ को रम्ज़-ए-आया-ए-इन्नल-मुलूकसल्तनत अक़्वाम-ए-ग़ालिब की है इक जादूगरीख़्वाब से बे-दार होता है ज़रा महकूम अगरफिर सुला देती है उस को हुक्मराँ की साहिरीजादू-ए-महमूद की तासीर से चश्म-ए-अयाज़देखती है हलक़ा-ए-गर्दन में साज़-ए-दिल-बरीख़ून-ए-इस्राईल आ जाता है आख़िर जोश मेंतोड़ देता है कोई मूसा तिलिस्म-ए-सामरीसरवरी ज़ेबा फ़क़त उस ज़ात-ए-बे-हम्ता को हैहुक्मराँ है इक वही बाक़ी बुतान-ए-आज़रीअज़ ग़ुलामी फ़ितरत-ए-आज़ाद रा रुस्वा मकुनता-तराशी ख़्वाजा-ए-अज़-बरहमन काफ़िर तिरीहै वही साज़-ए-कुहन मग़रिब का जम्हूरी निज़ामजिस के पर्दों में नहीं ग़ैर-अज़-नवा-ए-क़ैसरीदेव-ए-इस्तिब्दाद जम्हूरी क़बा में पा-ए-कूबतू समझता है ये आज़ादी की है नीलम-परीमज्लिस-ए-आईन-ओ-इस्लाह-ओ-रिआयात-ओ-हुक़ूक़तिब्ब-ए-मग़रिब में मज़े मीठे असर ख़्वाब-आवरीगर्मी-ए-गुफ़्तार आज़ा-ए-मजालिस अल-अमाँये भी इक सरमाया-दारों की है जंग-ए-ज़रगरीइस सराब-ए-रंग-ओ-बू को गुलिस्ताँ समझा है तूआह ऐ नादाँ क़फ़स को आशियाँ समझा है तूसरमाया-ओ-मेहनत
दिल में नाकाम उमीदों के बसेरे पाएरौशनी लेने को निकला तो अँधेरे पाए
दयार-ए-शर्क़ की आबादियों के ऊँचे टीलों परकभी आमों के बाग़ों में कभी खेतों की मेंडों परकभी झीलों के पानी में कभी बस्ती की गलियों मेंकभी कुछ नीम उर्यां कमसिनों की रंगरलियों मेंसहर-दम झुटपुटे के वक़्त रातों के अँधेरे मेंकभी मेलों में नाटक-टोलियों में उन के डेरे मेंतआक़ुब में कभी गुम तितलियों के सूनी राहों मेंकभी नन्हे परिंदों की नहुफ़्ता ख़्वाब-गाहों मेंबरहना पाँव जलती रेत यख़-बस्ता हवाओं मेंगुरेज़ाँ बस्तियों से मदरसों से ख़ानक़ाहों मेंकभी हम-सिन हसीनों में बहुत ख़ुश-काम ओ दिल-रफ़्ताकभी पेचाँ बगूला साँ कभी ज्यूँ चश्म-ए-ख़ूँ-बस्ताहवा में तैरता ख़्वाबों में बादल की तरह उड़तापरिंदों की तरह शाख़ों में छुप कर झूलता मुड़तामुझे इक लड़का आवारा-मनुश आज़ाद सैलानीमुझे इक लड़का जैसे तुंद चश्मों का रवाँ पानीनज़र आता है यूँ लगता है जैसे ये बला-ए-जाँमिरा हम-ज़ाद है हर गाम पर हर मोड़ पर जौलाँइसे हम-राह पाता हूँ ये साए की तरह मेरातआक़ुब कर रहा है जैसे मैं मफ़रूर मुल्ज़िम हूँये मुझ से पूछता है अख़्तर-उल-ईमान तुम ही हो
ज़िंदगी के जितने दरवाज़े हैं मुझ पे बंद हैंदेखना हद्द-ए-नज़र से आगे बढ़ कर देखना भी जुर्म हैसोचना अपने अक़ीदों और यक़ीनों से निकल कर सोचना भी जुर्म हैआसमाँ-दर-आसमाँ असरार की परतें हटा कर झाँकना भी जुर्म हैक्यूँ भी कहना जुर्म है कैसे भी कहना जुर्म हैसाँस लेने की तो आज़ादी मयस्सर है मगरज़िंदा रहने के लिए इंसान को कुछ और भी दरकार हैऔर इस कुछ और भी का तज़्किरा भी जुर्म हैऐ ख़ुदावंदान-ए-ऐवान-ए-अक़ाएदऐ हुनर-मन्दान-ए-आईन-ओ-सियासतज़िंदगी के नाम पर बस इक इनायत चाहिएमुझ को इन सारे जराएम की इजाज़त चाहिए
ये अक़्ल-ओ-फ़हम बड़ी चीज़ हैं मुझे तस्लीममगर लगा नहीं सकते हम इस का अंदाज़ाकि आदमी को ये पड़ती हैं किस क़दर महँगीइक एक कर के वो तिफ़्ली के हर ख़याल की मौतबुलूग़-ए-सिन में वो सदमे नए ख़यालों केनए ख़याल का धचका नए ख़याल की टीसनए तसव्वुरों का कर्ब, अल-अमाँ कि हयाततमाम ज़ख़्म निहाँ है तमाम नश्तर हैये चोट खा के सँभलना मुहाल होता है
ये जब्र-कदा आज़ाद अफ़्कार का दुश्मन हैअरमानों का क़ातिल है उम्मीदों का रहज़न हैजज़्बात का मक़्तल है जज़्बात का मदफ़न है
सामराज के दोस्त हमारे दुश्मन हैंइन्ही से आँसू आहें आँगन आँगन हैंइन्ही से क़त्ल-ए-आम हुआ आशाओं काइन्ही से वीराँ उम्मीदों का गुलशन है
उस के फरमानों की एलानों की ताज़ीम करोराख तक़्सीम की अरमान भी तक़्सीम करो
मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतनगुल-पोश तेरी वादियाँफ़रहत-निशाँ राहत-रसाँतेरे चमन-ज़ारों पे हैगुलज़ार-ए-जन्नत का गुमाँहर शाख़ फूलों की छड़ीहर नख़्ल-ए-तूबा है यहाँकौसर के चश्मे जा-ब-जातसनीम हर आब-ए-रवाँहर बर्ग रूह-ए-ताज़गीहर फूल जान-ए-गुल्सिताँहर बाग़ बाग़-ए-दिल-कशीहर बाग़ बाग़-ए-बे-ख़िज़ाँदिलकश चरागाहें तिरीढोरों के जिन में कारवाँअंजुम-सिफ़त गुलहा-ए-नौहर तख़्ता-ए-गुल आसमाँनक़्श-ए-सुरय्या जा-ब-जाहर हर रविश इक कहकशाँतेरी बहारें दाइमीतेरी बहारें जावेदाँतुझ में है रूह-ए-ज़िंदगीपैहम रवाँ पैहम दवाँदरिया वो तेरे तुंद-ख़ूझीलें वो तेरी बे-कराँशाम-ए-अवध के लब पे हैहुस्न-ए-अज़ल की दास्ताँकहती है राज़-ए-सरमदीसुब्ह-ए-बनारस की ज़बाँउड़ता है हफ़्त-अफ़्लाक परउन कार-ख़ानों का धुआँजिन में हैं लाखों मेहनतीसनअत-गरी के पासबाँतेरी बनारस की ज़रीरश्क-ए-हरीर-ओ-परनियाँबीदर की फ़नकारी में हैंसनअत की सब बारीकियाँअज़्मत तिरे इक़बाल कीतेरे पहाड़ों से अयाँदरियाओं का पानी, तरीतक़्दीस का अंदाज़ा-दाँक्या 'भारतेंदु' ने कियागंगा की लहरों का बयाँ'इक़बाल' और चकबस्त हैंअज़्मत के तेरी नग़्मा-ख़्वाँ'जोश' ओ 'फ़िराक़' ओ 'पंत' हैंतेरे अदब के तर्जुमाँ'तुलसी' ओ 'ख़ुसरव' हैं तेरीतारीफ़ में रत्ब-उल-लिसाँगाते हैं नग़्मा मिल के सबऊँचा रहे तेरा निशाँमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतेरे नज़ारों के नगींदुनिया की ख़ातम में नहींसारे जहाँ में मुंतख़बकश्मीर की अर्ज़-ए-हसींफ़ितरत का रंगीं मोजज़ाफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींहाँ हाँ हमीं अस्त ओ हमींसरसब्ज़ जिस के दश्त हैंजिस के जबल हैं सुर्मगींमेवे ब-कसरत हैं जहाँशीरीं मिसाल-ए-अंग्बींहर ज़ाफ़राँ के फूल मेंअक्स-ए-जमाल-ए-हूरईंवो मालवे की चाँदनीगुम जिस में हों दुनिया-ओ-दींइस ख़ित्ता-ए-नैरंग मेंहर इक फ़ज़ा हुस्न-आफ़रींहर शय में हुस्न-ए-ज़िंदगीदिलकश मकाँ दिलकश ज़मींहर मर्द मर्द-ए-ख़ूब-रूहर एक औरत नाज़नींवो ताज की ख़ुश-पैकरीहर ज़ाविए से दिल-नशींसनअत-गरों के दौर कीइक यादगार-ए-मरमरींहोती है जो हर शाम कोफ़ैज़-ए-शफ़क़ से अहमरींदरिया की मौजों से अलगया इक बत-ए-नज़्ज़ारा-बींया ताएर-ए-नूरी कोईपर्वाज़ करने के क़रींया अहल-ए-दुनिया से अलगइक आबिद-ए-उज़्लत-गुज़ीनक़्श-ए-अजंता की क़समजचता नहीं अर्ज़ंग-ए-चींशान-ए-एलोरा देख करझुकती है आज़र की जबींचित्तौड़ हो या आगराऐसे नहीं क़िलए कहींबुत-गर हो या नक़्क़ाश होतू सब की अज़्मत का अमींमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनदिलकश तिरे दश्त ओ चमनरंगीं तिरे शहर ओ चमनतेरे जवाँ राना जवाँतेरे हसीं गुल पैरहनइक अंजुमन दुनिया है येतू इस में सद्र-ए-अंजुमनतेरे मुग़न्नी ख़ुश-नवाशाएर तिरे शीरीं-सुख़नहर ज़र्रा इक माह-ए-मुबींहर ख़ार रश्क-ए-नस्तरींग़ुंचा तिरे सहरा का हैइक नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतनकंकर हैं तेरे बे-बहापत्थर तिरे लाल-ए-यमनबस्ती से जंगल ख़ूब-तरबाग़ों से हुस्न अफ़रोज़ बनवो मोर वो कब्क-ए-दरीवो चौकड़ी भरते हिरनरंगीं-अदा वो तितलियाँबाँबी में वो नागों के फनवो शेर जिन के नाम सेलरज़े में आए अहरमनखेतों की बरकत से अयाँफ़ैज़ान-ए-रब्ब-ए-ज़ुल-मिननचश्मों के शीरीं आब सेलज़्ज़त-कशाँ काम-ओ-दहनताबिंदा तेरा अहद-ए-नौरौशन तिरा अहद-ए-कुहनकितनों ने तुझ पर कर दियाक़ुर्बान अपना माल धनकितने शहीदों को मिलेतेरे लिए दार-ओ-रसनकितनों को तेरा इश्क़ थाकितनों को थी तेरी लगनतेरे जफ़ा-कश मेहनतीरखते हैं अज़्म-ए-कोहकनतेरे सिपाही सूरमाबे-मिस्ल यक्ता-ए-ज़मन'भीषम' सा जिन में हौसला'अर्जुन' सा जिन में बाँकपनआलिम जो फ़ख़्र-ए-इल्म हैंफ़नकार नाज़ाँ जिन पे फ़न'राय' ओ 'बोस' ओ 'शेरगिल''दिनकर', 'जिगर' 'मैथली-शरण''वलाठोल', 'माहिर', भारती'बच्चन', 'महादेवी', 'सुमन''कृष्णन', 'निराला', 'प्रेम-चंद''टैगोर' ओ 'आज़ाद' ओ 'रमन'मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनखेती तिरी हर इक हरीदिलकश तिरी ख़ुश-मंज़रीतेरी बिसात-ए-ख़ाक केज़र्रे हैं महर-ओ-मुश्तरीझेलम कावेरी नाग वोगंगा की वो गंगोत्रीवो नर्बदा की तमकनतवो शौकत-ए-गोदावरीपाकीज़गी सरजू की वोजमुना की वो ख़ुश-गाैहरीदुल्लर्बा आब-ए-नील-गूँकश्मीर की नीलम-परीदिलकश पपीहे की सदाकोयल की तानें मद-भरीतीतर का वो हक़ सिर्रहुतूती का वो विर्द-ए-हरीसूफ़ी तिरे हर दौर मेंकरते रहे पैग़म्बरी'चिश्ती' ओ 'नानक' से मिलीफ़क़्र-ओ-ग़िना को बरतरीअदल-ए-जहाँगीरी में थीमुज़्मर रेआया-पर्वरीवो नव-रतन जिन से हुईतहज़ीब-ए-दौर-ए-अकबरीरखते थे अफ़्ग़ान-ओ-मुग़लइक सौलत-ए-अस्कंदरीरानाओं के इक़बाल कीहोती है किस से हम-सरीसावंत वो योद्धा तिरेतेरे जियाले वो जरीनीती विदुर की आज तककरती है तेरी रहबरीअब तक है मशहूर-ए-ज़माँ'चाणक्य' की दानिश-वरीवयास और विश्वामित्र सेमुनियों की शान-ए-क़ैसरीपातंजलि ओ साँख सेऋषियों की हिकमत-पर्वरीबख़्शे तुझे इनआम-ए-नौहर दौर चर्ख़-ए-चम्बरीख़ुश-गाैहरी दे आब कोऔर ख़ाक को ख़ुश-जौहरीज़र्रों को महर-अफ़्शानियाँक़तरों को दरिया-गुस्तरीमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतू रहबर-ए-नौ-ए-बशरतू अम्न का पैग़ाम-बरपाले हैं तू ने गोद मेंसाहिब-ख़िरद साहिब-ए-नज़रअफ़ज़ल-तरीं इन सब में हैबापू का नाम-ए-मो'तबरहर लफ़्ज़ जिस का दिल-नशींहर बात जिस की पुर-असरजिस ने लगाया दहर मेंनारा ये बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तरबे-कार हैं तीर-ओ-सिनाँबे-सूद हैं तेग़-ओ-तबरहिंसा का रस्ता झूट हैहक़ है अहिंसा की डगरदरमाँ है ये हर दर्द काये हर मरज़ का चारा-गरजंगाह-ए-आलम में कोईइस से नहीं बेहतर सिपरकरता हूँ मैं तेरे लिएअब ये दुआ-ए-मुख़्तसररौनक़ पे हों तेरे चमनसरसब्ज़ हों तेरे शजरनख़्ल-ए-उमीद-ए-बेहतरीहर फ़स्ल में हो बारवरकोशिश हो दुनिया में कोईख़ित्ता न हो ज़ेर-ओ-ज़बरतेरा हर इक बासी रहेनेको-सिफ़त नेको-सियरहर ज़न सलीक़ा-मंद होहर मर्द हो साहिब-हुनरजब तक हैं ये अर्ज़ ओ फ़लकजब तक हैं ये शम्स ओ क़मरमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतन
हमीं तो हैं वोजो तय करेंगेकि इन के जिस्मों पे किस का हक़ हैहमीं तो हैं वोजो तय करेंगेकि किस से इन के निकाह होंगेये किस के बिस्तर की ज़ीनतें हैंवो कौन होगा जो अपने होंटों कोइन के जिस्मों की आब देगाभले मोहब्बत किसी के कहने पेआज तक हो सकी न होगीमगर ये हम तय करेंगेइन को किसे बसाना है अपने दिल मेंहम इन के मालिक हैंजब भी चाहेंइन्हें लिहाफ़ों में खींच लाएँऔर इन की रूहों में दाँत गाड़ेंये माँ बनेंगीतो हम बताएँगेइन के जिस्मों ने कितने बच्चों को ढालना हैहमारे बच्चों के पेट भरनेअगर ये कोठे पे जा के अपना बदन भी बेचेंतो हम बताएँगेकिस को कितने में कितना बेचेंहमीं को हक़ हैकि इन के गाहक जो ख़ुद हमीं हैं सेसारी क़ीमत वसूल कर लेंहमीं को हक़ है कि इन की आँखेंहसीन चेहरे शफ़्फ़ाफ़ पाँवसफ़ेद रानें दराज़ ज़ुल्फ़ेंऔर आतिशीं-लब दिखा दिखा करक्रीम साबुन सफ़ेद कपड़े और आम बेचेंदुकाँ चलाएँ नफ़' कमाएँहमीं तो हैं जो ये तय करेंगेये किस सहीफ़े की कौन सी आयतें पढ़ेंगीये कौन होती हैंअपनी मर्ज़ी का रंग पहनेंइस्कूल जाएँ हमें पढ़ाएँहमें बताएँकि इन का रब भी वही है जिस ने हमें बनायाबराबरी के सबक़ सिखाएँये लौंडियाँ हैं ये जूतियाँ हैंये कौन होती हैं अपनी मर्ज़ी से जीने वालीबताने वाले हमें यही तो बता गए हैंजो हुक्मरानों की बात टालेंजो अपने भाई से हिस्सा माँगेंजो शौहरों को ख़ुदा न समझेंजो क़द्रे मुश्किल सवाल पूछेंजो अपनी मेहनत का बदला माँगेंजो आजिरों से ज़बाँ लड़ाएँजो अपने जिस्मों पे हक़ जताएँवो बे-हया हैं
बुझ रहे हैं एक इक कर के 'अक़ीदों के दिएइस अँधेरे का भी लेकिन सामना करना तो है
मुफ़्लिस की जवानी ईद के दिन जब सुब्ह से आहें भरती हैदुनिया ये अमीरों की दुनिया तब ईद की ख़ुशियाँ करती है
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