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नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
फ़लक पर लुक्का-ए-अब्र-ए-सुबुक-रफ़्तार रक़्साँ था
बहिश्त-ए-हुस्न था दुनिया की बरनाई का हर ज़र्रा
शातिर हकीमी
नज़्म
अब्र-ए-गौहर-बार बन कर हिन्द में आया था तू
अहल-ए-दुनिया के लिए पैग़ाम-ए-हक़ लाया था तू