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नज़्म
वो ये कहते हैं हर इक ज़ुल्म तिरे हुक्म से है
गर ये सच है तो तिरे अद्ल से इंकार करूँ?
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
अभी हावी है अक़्ल ओ रूह पर झूटी ख़ुदावंदी
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर