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नज़्म
अज़्म-ए-रासिख़ भी है तुझ में शौकत-ए-दारा भी है
लश्कर-ए-जर्रार का तू अफ़सर-ए-आ'ला भी है
शातिर हकीमी
नज़्म
गर्दिश-ए-दौराँ पे कोई फ़त्ह पा सकता नहीं
तेरे लब पर शिकवा-ए-आलाम-ए-दौराँ है तो क्या
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
उन ज़ईफ़ों के सहारे को असा बन जाऊँ
ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ का हर सम्त में चर्चा कर दूँ
हामिदुल्लाह अफ़सर
नज़्म
इक अदीब-ए-नामवर इक अफ़सर-ए-आ'ली-मक़ाम
ज़ात सक्सेना है जिस की राम बाबू जिस का नाम
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
वो जो पहले था कभी बंदर मदारी बन गया
या'नी मज़दूर अफ़सर-ए-सरमाया-कारी बन गया