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नज़्म
आज होती है हसद बुग़्ज़-ओ-जफ़ा की तरदीद
इस लिए अहल-ए-वतन सब को मुबारक हो ईद
रंगेशवर दयाल सक्सेना सूफ़ी
नज़्म
ता-रोज़-ए-हश्र अहल-ए-वतन को रहेंगे याद
हिन्दोस्ताँ की फ़ौज-ए-ज़फ़र-मौज ज़िंदाबाद
तिलोकचंद महरूम
नज़्म
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
फ़र्ज़ करो हम अहल-ए-वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों
फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूटी हों अफ़्साने हों
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
मुनव्वर सीना हो जाए फ़रोग़-ए-शम'-ए-उल्फ़त से
दिल-ए-अहल-ए-वतन को भी फ़रोज़ाँ चाहता हूँ मैं
अब्दुल क़य्यूम ज़की औरंगाबादी
नज़्म
अर्श मलसियानी
नज़्म
मगर मेरे अहल-ए-वतन मुझ को ग़द्दार कहने लगे हैं
ब-ज़ाहिर तो है गरचे ये मेरी ज़िल्लत