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नज़्म
तू शनासा-ए-ख़राश-ए-उक़्दा-ए-मुश्किल नहीं
ऐ गुल-ए-रंगीं तिरे पहलू में शायद दिल नहीं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
निगाह-ए-ग़ौर से देखो अगर हालात-ए-इंसानी
तो हो सकता है हल ये उक़्दा-ए-मुश्किल ब-आसानी
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
इस के दम से हम पे वाज़ेह उक़्दा-ए-मर्ग-ओ-हयात
इस के दम से हम पे रौशन है जहान-ए-काएनात
अता आबिदी
नज़्म
बहस रहती थी कि है कौन वफ़ा का पाबंद
हैफ़ ये उक़्दा-ए-सर-बस्ता खुला तेरे बाद
ज़ाहिदा ख़ातून शरवानिया
नज़्म
‘उक़्दा-कुशा हो नाख़ुन-ए-तदबीर क्या 'अजब
फिर बढ़ चली है 'उक़्दा-ए-मुश्किल की आरज़ू
अब्दुल मन्नान बेदिल अज़ीमाबादी
नज़्म
लाख सर मारा मगर उक़्दा-ए-मा'नी न खुला
कौन हूँ क्या हूँ मैं सद-हैफ़ न समझा असलन
ख्वाजा मंज़र हसन मंज़र
नज़्म
ये 'ख़ुसरो' 'मीर' 'ग़ालिब' का ख़राबा बेचता क्या है
हमारा 'ग़ालिब'-ए-आज़म था चोर आक़ा-ए-'बेदिल' का
जौन एलिया
नज़्म
अदा-ए-लग़्ज़िश-ए-पा पर क़यामतें क़ुर्बां
बयाज़-रुख़ पे सहर की सबाहतें क़ुर्बां