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नज़्म
ग़रज़ इस हसरत-ओ-अंदोह-ओ-यास-ओ-ग़म की बस्ती में
कहीं दौर-आफ़रीं होता, कहीं दर्द-आश्ना होता
जमील मज़हरी
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
अब वक़्त है दीदार का दम है कि नहीं है
अब क़ातिल-ए-जाँ चारा-गर-ए-कुल्फ़त-ए-ग़म है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
अली मोहम्मद फ़र्शी
नज़्म
ख़ार-ज़ार-ए-ग़म को पैरों से कुचलना है हमें
जादा-ए-मंज़िल में गिरना है सँभलना है हमें
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मिरी जाँ से फुसून-ए-सोज़-ओ-ग़म छिन क्यों नहीं जाता
न जाने मेरे दिल की ख़ुद-फ़रेबी क्यों नहीं जाती
सिद्दीक़ कलीम
नज़्म
कर चुकी ख़ून-ए-तमन्ना तीरगी-ए-शाम-ए-ग़म
आसमाँ पर अब नया सूरज दरख़्शाँ है तो क्या