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नज़्म
आग के वो हाए शोले और वो मुखड़ा चाँद सा
लब पे कम कम शोख़ी-ए-बर्क़-ए-तबस्सुम की अदा
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
मैं ने जिस ज़ो'म में रुस्वाई के ता'ने झेले
उस का अंजाम-ए-बला-ख़ेज़ मिरे पास आया
मोहम्मद शामिमुज्जामा
नज़्म
चमक हीरे से बढ़ कर ऐ तबस्सुम तुझ में पिन्हाँ है
उन्हीं होंटों पे ज़ौ बिखरा तू जिन होंटों को शायाँ है
अमजद नजमी
नज़्म
मेरी फ़ितरत को भी है अश्क-ओ-तबस्सुम में तमीज़
मैं ने सोचा है कि मैं भी तुम्हें बदनाम करूँ
प्रेम वारबर्टनी
नज़्म
अश्क-ए-ख़ूनीं में नज़र आई तबस्सुम की झलक
नग़्मा-ए-बुलबुल बनी ख़ामोश फूलों की महक