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नज़्म
काहे दिल के वीराने में चाहत का इक अंकुर फूटा
झोंका एक हवा का आया पल में उखड़ा जड़ से बूटा
सदा अम्बालवी
नज़्म
वो ये कहते हैं हर इक ज़ुल्म तिरे हुक्म से है
गर ये सच है तो तिरे अद्ल से इंकार करूँ?