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नज़्म
कुछ ख़्वाब हैं परवर्दा-ए-अनवार मगर उन की सहर गुम
जिस आग से उठता है मोहब्बत का ख़मीर उस के शरर गुम
नून मीम राशिद
नज़्म
यहाँ उस्मान बाबा वाला ऊँचा ता'ज़िया अब भी खड़ा होता है
जिस की झिलमिलाहट मेरे अंदर ऐसे रक़्साँ है
इशरत आफ़रीं
नज़्म
इस चका-चौंद में अब तुझ को पुकारूँ कैसे
सैल-ए-अनवार में तारों का गुज़र क्या होगा