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नज़्म
चश्म-ब-राह नज़र आते हैं वो नक़्द-ए-निगार
जिन की फ़ितरत को उपज से नहीं बिल्कुल सरोकार
अली मंज़ूर हैदराबादी
नज़्म
थी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्या
अर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्या
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं
तेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराब