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नज़्म
जिस दिन से मिले हैं दोनों का सब चैन गया आराम गया
चेहरों से बहार-ए-सुब्ह गई आँखों से फ़रोग़-ए-शाम गया
अख़्तर शीरानी
नज़्म
मेरा इल्हाम तिरा ज़ेहन-ए-रसा भी पत्थर
इस ज़माने में तो हर फ़न का निशाँ पत्थर है
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
और इन सब में इक मैं भी हूँ लेकिन बस तू ही नहीं
हैं और तो सब आराम मुझे इक गेसुओं की ख़ुशबू ही नहीं
मीराजी
नज़्म
ये मिरी उम्र का बे-मंज़िल ओ आराम सफ़र
क्या यही कुछ मिरी क़िस्मत में लिखा है तू ने