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नज़्म
इल्मी शग़फ़ से उस के नहीं कौन बा-ख़बर
हर क़ल्ब पर फ़साने हुए नक़्श कलहजर
रंगेशवर दयाल सक्सेना सूफ़ी
नज़्म
'आदिल' हैं हम भी ज़ाइक़े से उन के बा-ख़बर
पानी हमारे मुँह में भी लाती हैं टॉफ़ियाँ
आदिल असीर देहलवी
नज़्म
मुझ से मिलने आए बैरूनी ममालिक से बशर
वो हैं मेरी मम्लिकत से मुझ से ज़्यादा बा-ख़बर
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
सब नशे में मस्त हैं लेकिन हैं कितने बा-ख़बर
फिर रहे हैं सब के सब इक दूसरे को थाम कर
जगन्नाथ आज़ाद
नज़्म
सब अपनी अपनी किताब की रू से अपने बारे में बा-ख़बर हैं
तो फिर हमारे ही पुश्त पर हाथ क्यूँ बंधे हैं
नसीम सय्यद
नज़्म
वो वैसे भी रहा करती हैं अपनी माँ के घर ज़्यादा
वहाँ रह कर भी वो रहती हैं मुझ से बा-ख़बर ज़्यादा