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नज़्म
नज़र आती है जिस को ख़्वाब में वो सूरत-ए-दिलकश
वो अपना दिल बना लेता है काशाना कनहैया का
जूलियस नहीफ़ देहलवी
नज़्म
दौलत की आँखों का सुर्मा बनता है हमारी हड्डी से
मंदिर के दिए भी जलते हैं मज़दूर की पिघली चर्बी से
जमील मज़हरी
नज़्म
चमकती बर्फ़ की सूरत पिघलता है!
अगरचे यूँ पिघलने से ये पत्थर, संग-रेज़ा तो नहीं बनता!
अमजद इस्लाम अमजद
नज़्म
में जो बे-मर्ज़ी निकल आया तो डाँटा है बहुत
मौलवी ने मुख़्तलिफ़ ख़ानों में बाँटा है बहुत