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नज़्म
ख़ल्वत-ओ-जल्वत में तुम मुझ से मिली हो बार-हा
तुम ने क्या देखा नहीं मैं मुस्कुरा सकता नहीं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
कमाल अहमद सिद्दीक़ी
नज़्म
मैं उस को बार-हा समझा चुका हूँ
माज़ी-ए-मरहूम का मातम तो कर सकते हैं, वापस ला नहीं सकते
गोपाल मित्तल
नज़्म
ताकि पूरी हो मोहब्बत की इक उम्मीद-ए-फ़ुज़ूल
बार-हा झोंका किया इंसाफ़ की आँखों में धूल
जमील मज़हरी
नज़्म
हुआ है बार-हा एहसास मुझ को इस हक़ीक़त का
तिरे नज़दीक रह कर भी मैं तुझ को पा नहीं सकता