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नज़्म
निकल कर हिन्द से पहुँची ये अमरीका और अफ़्रीक़ा
समझ लेते हैं हर मुल्कों के बाशिंदे ज़बाँ उर्दू
निसार कुबरा अज़ीमाबादी
नज़्म
ख़ुदा के नथनों से बहती वहशत का इर्तिकाज़
और मिर्रीख़ी बाशिंदे की चीख़ हम पर टूट पड़ेगी
हसन अल्वी
नज़्म
दुनिया में चल-फिर कर तुम ने देखे होंगे इंसान बहुत
लेकिन इस मुल्क के बाशिंदे सब के सब हैं नादान बहुत
सलाम संदेलवी
नज़्म
मैं रफ़्ता रफ़्ता पहुँचने लगा ब-सिन्न-ए-शुऊर
तो जुगनुओं की हक़ीक़त समझ में आने लगी
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
ऐ हिन्द के बाशिंदो आओ उजड़ा गुलज़ार सजा डालें
अब दौर-ए-ग़ुलामी ख़त्म हुआ इक ताज़ा जहाँ की बिना डालें
कँवल डिबाइवी
नज़्म
दिल्ली क्या है दिल वालों की आँखों का इक सपना है
इस बस्ती का हर बाशिंदा जैसे कोई अपना है