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नज़्म
राह-ए-बद-ओ-राह-ए-नजात हैं मेरे इख़्तियार में
ग़म हैं मगर ये रास्ते रंग-ब-रंग ग़ुबार में
मीर यासीन अली ख़ाँ
नज़्म
कोह-ओ-राग़-ओ-अब्र-ओ-बाद-ओ-महर-ओ-मह जिन्न-ओ-बशर
नूर-ए-हुस्न-ए-हक़ से हैं ये सब मुनव्वर सर-बसर
हामिद हसन क़ादरी
नज़्म
तूफ़ान था बाद-ओ-बाराँ का बिजली भी कड़कती फिरती थी
सर्दी से फटा जाता था बदन वो बर्फ़ ज़मीं पर गिरती थी
अमीर औरंगाबादी
नज़्म
तिलिस्म-ए-बाद-ओ-बाराँ में कोई तूफ़ाँ न होता
मोहब्बत ख़त्म हो जाने का भी इम्काँ न होता
ज़ीशान साहिल
नज़्म
बलराज कोमल
नज़्म
इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर
इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन
जौन एलिया
नज़्म
बढ़ रही हैं गोद फैलाए हुए रुस्वाइयाँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ