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नज़्म
मुझे तू ने फ़ितरत के बा'द
सनम-ख़ाना-ए-कायनात-ए-आज़री के तिलिस्मात किसे आ के बाहर निकाला
शहाब जाफ़री
नज़्म
सनम-ख़ाना-ए-काएनात, आज़री के तिलिस्मात से आ के बाहर निकाला
मिरे ख़ौफ़ से काँपते दिल को
शहाब जाफ़री
नज़्म
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात