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नज़्म
यूसुफ़-ए-मुल्क-ए-मआनी पीर-ए-कनआ'न-ए-सुख़न
है तिरी हर बैत अहल-ए-दर्द को बैत-उल-हुज़न
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
नज़्म
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
नज़्म
ये तिरा बैत-ए-मुक़द्दस तिरी रिफ़अत का मज़ार
किस की मनहूस निगाहों का बना आज शिकार
वामिक़ जौनपुरी
नज़्म
'इश्वा-ओ-नाज़-ओ-अदा जौर-ओ-जफ़ा की बात हो
तज़्किरा बैतुस-सनम का या ख़ुदा की ज़ात हो
बिसमिल आज़मी
नज़्म
है अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद
कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद