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नज़्म
मौत ने कितने घूँघट मारे बदले सौ सौ भेस
काल बकुट फैलाए रहा है बीमारी का जाल रे साथी
वामिक़ जौनपुरी
नज़्म
छप रही है मसनवी-ए-'मीर' भी बा-ख़त्त-ए-'मीर'
अब जदीद उर्दू अदब का हो रहा है इंतिज़ाम
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
गुमाँ ये है कि बाक़ी है बक़ा हर आन फ़ानी है
कहानी सुनने वाले जो भी हैं वो ख़ुद कहानी हैं