aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "barpaa"
हदफ़ होंगे तुम्हारा कौन तुम किस के हदफ़ होगेन जाने वक़्त की पैकार में तुम किस तरफ़ होगेहै रन ये ज़िंदगी इक रन जो बरपा लम्हा लम्हा हैहमें इस रन में कुछ भी हो किसी जानिब तो होना हैसो हम भी इस नफ़स तक हैं सिपाही एक लश्कर केहज़ारों साल से जीते चले आए हैं मर मर केशुहूद इक फ़न है और मेरी अदावत बे-फ़नों से हैमिरी पैकार अज़ल सेये 'ख़ुसरो' 'मीर' 'ग़ालिब' का ख़राबा बेचता क्या हैहमारा 'ग़ालिब'-ए-आज़म था चोर आक़ा-ए-'बेदिल' कासो रिज़्क़-ए-फ़ख़्र अब हम खा रहे हैं 'मीर'-ए-बिस्मिल कासिधारत भी था शर्मिंदा कि दो-आबे का बासी थातुम्हें मालूम है उर्दू जो है पाली से निकली हैवो गोया उस की ही इक पुर-नुमू डाली से निकली है
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैंतुम्हारे घर में क़यामत का शोर बरपा है
एक आया गया दूसरा आएगा देर से देखता हूँ यूँही रात उस की गुज़र जाएगीमैं खड़ा हूँ यहाँ किस लिए मुझ को क्या काम है याद आता नहीं याद भी टिमटिमाताहुआ इक दिया बन गई जिस की रुकती हुई और झिझकती हुई हर किरन बे-सदा क़हक़हा हैमगर मेरे कानों ने कैसे उसे सुन लिया एक आँधी चली चल के मिटभी गई आज तक मेरे कानों में मौजूद है साएँ साएँ मचलती हुई औरउबलती हुई फैलती फैलती देर से मैं खड़ा हूँ यहाँ एक आया गयादूसरा आएगा रात उस की गुज़र जाएगी एक हंगामा बरपा है देखें जिधरआ रहे हैं कई लोग चलते हुए और टहलते हुए और रुकते हुए फिर सेबढ़ते हुए और लपकते हुए आ रहे जा रहे हैं इधर से उधर और उधर सेइधर जैसे दिल में मिरे ध्यान की लहर से एक तूफ़ान है वैसे आँखेंमिरी देखती ही चली जा रही हैं कि इक टिमटिमाते दिए की किरन ज़िंदगी को फिसलतेहुए और गिरते हुए ढब से ज़ाहिर किए जा रही है मुझे ध्यानआता है अब तीरगी इक उजाला बनी है मगर इस उजाले से रिसती चली जा रहीहैं वो अमृत की बूँदें जिन्हें मैं हथेली पे अपनी सँभाले रहा हूँ हथेलीमगर टिमटिमाता हुआ इक दिया बन गई थी लपक से उजाला हुआ लौ गिरी फिर अंधेरा साछाने लगा बैठता बैठता बैठ कर एक ही पल में उठता हुआ जैसे आँधी केतीखे थपेड़ों से दरवाज़े के ताक़ खुलते रहें बंद होते रहेंफड़फड़ाते हुए ताइर-ए-ज़ख़्म-ख़ुर्दा की मानिंद मैं देखता ही रहा एक आयागया दूसरा आएगा सोच आई मुझे पाँव बढ़ने से इंकार करतेगए मैं खड़ा ही रहा दिल में इक बूँद ने ये कहा रात यूँही गुज़र जाएगीदिल की इक बूँद को आँख में ले के मैं देखता ही रहा फड़फड़ाते हुए ताइरज़ख़्म-ख़ुर्दा की मानिंद दरवाज़े के ताक़ इक बार जब मिल गए मुझ को आहिस्ता आहिस्ताएहसास होने लगा अब ये ज़ख़्मी परिंदा न तड़पेगा लेकिन मिरे दिल को हर वक़्ततड़पाएगा मैं हथेली पे अपनी सँभाले रहूँगा वो अमृत की बूँदें जिन्हें आँखसे मेरी रिस्ना था लेकिन मिरी ज़िंदगी टिमटिमाता हुआ इक दिया बन गई जिस की रुकती हुईऔर झिझकती हुई हर किरन बे-सदा क़हक़हा है कि इस तीरगी में कोई बात ऐसी नहींजिस को पहले अंधेरे में देखा हो मैं ने सफ़र ये उजाले अंधेरे का चलतारहा है तो चलता रहेगा यही रस्म है राह की एक आया गया दूसराआएगा रात ऐसे गुज़र जाएगी टिमटिमाते सितारे बताते थे रस्ते कीनद्दी बही जा रही है बहे जा इस उलझन से ऐसे निकल जा कोई सीधा मंज़िल पे जाताथा लेकिन कई क़ाफ़िले भूल जाते थे अंजुम के दौर-ए-यगाना के मुबहम इशारे मगर वोभी चलते हुए और बढ़ते हुए शाम से पहले ही देख लेते थे मक़्सूद का बंददरवाज़ा खुलने लगा है मगर मैं खड़ा हूँ यहाँ मुझ को क्या काम है मेरा दरवाज़ाखुलता नहीं है मुझे फैले सहरा की सोई हुई रेग का ज़र्रा ज़र्रा यही कह रहा हैके ऐसे ख़राबे में सूखी हथेली है इक ऐसा तलवा के जिस को किसी ख़ार की नोक चुभने पे भीकह नहीं सकती मुझ को कोई बूँद अपने लहू की पिला दो मगर मैं खड़ा हूँ यहाँ किस लिएकाम कोई नहीं है तो मैं भी इन आते हुए और जाते हुए एक दो तीनलाखों बगूलों में मिल कर यूँही चलते चलते कहीं डूब जाता के जैसे यहाँबहती लहरों में कश्ती हर एक मौज को थाम लेती है अपनी हथेली के फैले कँवलमें मुझे ध्यान आता नहीं है कि इस राह में तो हर इक जाने वाले के बसमें है मंज़िल मैं चल दूँ चलूँ आइए आइए आप क्यूँ इस जगहऐसे चुप-चाप तन्हा खड़े हैं अगर आप कहिए तो हम इक अछूती सी टहनी सेदो फूल बस बस मुझे इस की कोई ज़रूरत नहीं है मैं इकदोस्त का रास्ता देखता हूँ मगर वो चला भी गया है मुझे फिर भीतस्कीन आती नहीं है कि मैं एक सहरा का बाशिंदा मालूम होने लगा हूँ ख़ुदअपनी नज़र में मुझे अब कोई बंद दरवाज़ा खुलता नज़र आए ये बात मुमकिन नहीं हैमैं इक और आँधी का मुश्ताक़ हूँ जो मुझे अपने पर्दे में यकसर छुपा लेमुझे अब ये महसूस होने लगा है सुहाना समाँ जितना बस में था मेरेवो सब एक बहता सा झोंका बना है जिसे हाथ मेरे नहीं रोक सकतेकि मेरी हथेली में अमृत की बूँदें तो बाक़ी नहीं हैं फ़क़त एक फैला हुआख़ुश्क बे-बर्ग बे-रंग सहरा है जिस में ये मुमकिन नहीं मैं कहूँएक आया गया दूसरा आएगा रात मेरी गुज़र जाएगी
गर्मी की तपिश बुझाने वालीसर्दी का पयाम लाने वालीक़ुदरत के अजाइबात की काँआरिफ़ के लिए किताब-ए-इरफ़ाँवो शाख़-ओ-दरख़्त की जवानीवो मोर-ओ-मलख़ की ज़िंदगानीवो सारे बरस की जान बरसातवो कौन-ए-ख़ुदा की शान बरसातआई है बहुत दुआओं के बा'दवो सैकड़ों इल्तिजाओं के बा'दवो आई तो आई जान में जाँसब थे कोई दिन के वर्ना मेहमाँगर्मी से तड़प रहे थे जान-दारऔर धूप में तप रहे थे कोहसारभूबल से सिवा था रेग-ए-सहराऔर खौल रहा था आब-ए-दरियासांडे थे बिलों में मुँह छुपाएऔर हाँप रहे थे चारपाएथीं लोमड़ियाँ ज़बाँ निकालेऔर लू से हिरन हुए थे कालेचीतों को न थी शिकार की सुधहिरनों को न थी क़तार की सुधथे शेर पड़े कछार में सुस्तघड़ियाल थे रूद-बार में सुस्तढोरों का हुआ था हाल पतलाबैलों ने दिया था डाल कंधाभैंसों के लहू न था बदन मेंऔर दूध न था गऊ के थन मेंघोड़ों का छुटा था घास दानाथा प्यास का उन पे ताज़ियानागर्मी का लगा हुआ था भबकाऔर अंस निकल रहा था सब कातूफ़ान थे आँधियों के बरपाउठता था बगूले पर बगूलाआरे थे बदन पे लू के चलतेशो'ले थे ज़मीन से निकलतेथी आग का दे रही हवा कामथा आग का नाम मुफ़्त बद-नामरस्तों में सवार और पैदलसब धूप के हाथ से थे बेकलघोड़ों के न आगे उठते थे पाँवमिलती थी कहीं जो रूख की छाँवथी सब की निगाह सू-ए-अफ़्लाकपानी की जगह बरसती थी ख़ाक
मैं जब नहीं रहूँगी भला क्या करेंगे आपहर लम्हा मेरे वास्ते रोया करेंगे आपक़ुर्बत को मेरे प्यार की ढूँडा करेंगे आपइक हश्र इस जहान में बरपा करेंगे आप
बोलीं अमाँ 'मोहम्मद-अली' कीजान बेटा ख़िलाफ़त पे दे दोसाथ तेरे हैं 'शौकत-अली' भीजान बेटा ख़िलाफ़त पे दे दोगर ज़रा सुस्त देखूँगी तुम कोदूध हरगिज़ न बख़्शूँगी तुम कोमैं दिलावर न समझूँगी तुम कोजान बेटा ख़िलाफ़त पे दे दोग़ैब से मेरी इमदाद होगीअब हुकूमत ये बर्बाद होगीहश्र तक अब न आबाद होगीजान बेटा ख़िलाफ़त पे दे दोखाँसी आए अगर तुम को जानीमाँगना मत हुकूमत से पानीबूढ़ी अमाँ का कुछ ग़म न करनाकलमा पढ़ पढ़ ख़िलाफ़त पे मरनापूरे उस इम्तिहाँ में उतरनाजान बेटा ख़िलाफ़त पे दे दोहोते मेरे अगर सात बेटेकरती सब को ख़िलाफ़त पे सदक़ेहैं यही दीन-ए-अहमद के रस्तेजान बेटा ख़िलाफ़त पे दे दोहश्र में हश्र बरपा करूँगीपेश-ए-हक़ तुम को ले के चलूँगीइस हुकूमत पे दावा करूँगीजान बेटा ख़िलाफ़त पे दे दोचैन हम ने 'शफ़ीक़' अब न पायाजान बेटा ख़िलाफ़त पे दे दो
आसमाँ के चेहरे पर बे-शुमार आँखें हैंबे-शुमार आँखों में बे-हिसाब मंज़र हैंमंज़रों के आईने अपने अपने चेहरों को ख़ुद ही देख सकते हैंख़ुद ही जान सकते हैं अपनी बे-नवाई कोवुसअ'तों की चादर पर सिलवटें बहुत सी हैंइस ख़मोश दुनिया में आहटें बहुत सी हैंआती जाती लहरों का अज़दहाम रहता हैवक़्त एक ख़ंजर हैबे-नियाम रहता हैये अजीब दुनिया है जिस में कुछ नहीं मिलताफिर भी एक लम्हे में बे-शुमार तारीख़ेंयूँ बदलती रहती हैंजैसे ख़ुश्क पत्तों का ढेर उड़ता फिरता हैबे-कनार सम्तों मेंबे-शुमार सम्तों में बे-शुमार आँखें हैंकुछ नहीं है तकने को और हज़ार आँखें हैंरास्तों के धागे से हर तरफ़ लटकते हैंख़ाक के जज़ीरे सेहर तरफ़ भटकते हैंफिर भी आसमानों पर रात के अँधेरे मेंसुब्ह के सवेरे हैंये अजब मुअम्मा हैजिस तरफ़ भी हम देखेंटूटते हुए लम्हे भागते हुए रस्ते जागते हुए मंज़रआइनों के अंदर भी आइनों के बाहर भीएक शोर बरपा हैजिस को हम नहीं सुनतेऔर वो हम से कहता हैतुम भी मेरे जैसे होमैं भी मिटने वाला हूँ तुम भी मिटने वाले होआसमाँ के चेहरे पर बे-शुमार आँखें हैंबे-शुमार आँखों में बे-हिसाब मंज़र हैंमंज़रों के आईनेरंग रंग आईने के जवाब मंज़र हैंमंज़रों के अंदर भी सद हज़ार मंज़र हैंवो भी मिटने वाले हैंहम भी मिटने वाले हैं
आसमाँ की गोद में दम तोड़ता है तिफ़्ल-ए-अब्रजम रहा है अब्र के होंटों पे ख़ूँ-आलूद कफ़बुझते बुझते बुझ गई है अर्श के हुजरों में आगधीरे धीरे बिछ रही है मातमी तारों की सफ़ऐ सबा शायद तिरे हम-राह ये ख़ूँ-नाक शामसर झुकाए जा रही है शहर-ए-याराँ की तरफ़शहर-ए-याराँ जिस में इस दम ढूँढती फिरती है मौतशेर-दिल बांकों में अपने तीर-ओ-नश्तर के हदफ़इक तरफ़ बजती हैं जोश-ए-ज़ीस्त की शहनाइयाँइक तरफ़ चिंघाड़ते हैं अहरमन के तब्ल-ओ-दफ़जा के कहना ऐ सबा ब'अद-अज़-सलाम-ए-दोस्तीआज शब जिस दम गुज़र हो शहर-ए-याराँ की तरफ़दश्त-ए-शब में इस घड़ी चुप-चाप है शायद रवाँसाक़ी-ए-सुब्ह-ए-तरब नग़्मा-ब-लब साग़र-ब-कफ़वो पहुँच जाए तो होगी फिर से बरपा अंजुमनऔर तरतीब-ए-मक़ाम-ओ-मंसब-ओ-जाह-ओ-शरफ़
जहाँ में हर तरफ़ है इल्म ही की गर्म-बाज़ारीज़मीं से आसमाँ तक बस इसी का फ़ैज़ है जारीयही सरचश्मा-ए-असली है तहज़ीब-ओ-तमद्दुन काबग़ैर इस के बशर होना भी है इक सख़्त बीमारीबनाता है यही इंसान को कामिल-तरीन इंसाँसिखाता है यही अख़्लाक़ ओ ईसार ओ रवा-दारीयही क़ौमों को पहुँचाता है बाम-ए-औज-ओ-रिफ़अत परयही मुल्कों के अंदर फूँकता है रूह-ए-बेदारीइसी के नाम का चलता है सिक्का सारे आलम मेंइसी के सर पे रहता है हमेशा ताज-ए-सरदारीइसी के सब करिश्मे ये नज़र आते हैं दुनिया मेंइसी के दम से रौनक़ आलम-ए-इम्काँ की है सारीये ला-सिलकी, ये टेलीफ़ोन ये रेलें, ये तय्यारेये ज़ेर-ए-आब ओ बाला-ए-फ़लक इंसाँ की तर्रारीहुदूद-ए-इस्तवा क़ुतबैन से यूँ हो गए मुदग़मकि है अब रुबअ मस्कों जैसे घर की चार-दीवारीसमुंदर हो गए पायाब सहरा बिन गए गुलशनकिया साइंस ने भी ए'तराफ़-ए-इज्ज़-ओ-नाचारीबुख़ार ओ बर्क़ का जर्रार लश्कर है अब आमादाउगलवा ले ज़मीन ओ आसमाँ की दौलतें सारीग़रज़ चारों तरफ़ अब इल्म ही की बादशाही हैकि उस के बाज़ूओं में क़ुव्वत-ए-दस्त-ए-इलाही हैनिगाह-ए-ग़ौर से देखो अगर हालात-ए-इंसानीतो हो सकता है हल ये उक़्दा-ए-मुश्किल ब-आसानीवही क़ौमें तरक़्क़ी के मदारिज पर हैं फाएक़-तरकि है जिन में तमद्दुन और सियासत की फ़रावानीइसी के ज़ोम में है जर्मनी चर्ख़-ए-तफ़ाख़ुर परइसी के ज़ोर पर मिर्रीख़ का हम-सर है जापानीइसी की क़ुव्वत-ए-बाज़ू पे है मग़रूर अमरीकाइसी के बिल पर लड़की हो रही है रुस्तम-ए-सानीइशारे पर इसी के नक़्ल-ओ-हरकत है सब इटली कीइसी के ताबा-ए-फ़रमान हैं रूसी ओ ईरानीइसी के जुम्बिश-ए-अबरू पे है इंग्लैण्ड का ग़र्राइसी के हैं सब आवुर्दे फ़्रांसीसी ओ एल्बानीकोई मुल्क अब नहीं जिन में ये जौहर हो न रख़्शंदान ग़ाफ़िल इस से चीनी हैं न शामी हैं न अफ़्ग़ानीबग़ैर इस के जो रहना चाहते हैं इस ज़माने मेंसमझ रक्खें फ़ना उन के लिए है हुक्म-ए-रब्बानीज़माना फेंक देगा ख़ुद उन्हें क़अ'र-ए-हलाकत मेंवो अपने हाथ से होंगे ख़ुद अपनी क़ब्र के बानीज़माने में जिसे हो साहिब-ए-फ़तह-ओ-ज़फ़र होनाज़रूरी है उसे इल्म-ओ-हुनर से बहरा-वर होनातरक़्क़ी की खुली हैं शाहराहें दहर में हर सूनज़र आता है तहज़ीब-ओ-तमद्दुन से जहाँ ममलूचले जाते हैं उड़ते शहसवारान-ए-फ़लक-पैमाख़िराज-ए-तहनियत लेते हुए करते हुए जादूगुज़रते जा रहे हैं दूसरों को छोड़ते पीछेकभी होता है सहरा मुस्तक़र उन का कभी टापूकमर बाँधे हुए दिन रात चलने पर हैं आमादादिमाग़ अफ़्कार से और दिल वुफ़ूर-ए-शौक़ से मलूलअलग रह कर ख़याल-ए-ज़हमत ओ एहसास-ए-राहत सेलगे हैं अपनी अपनी फ़िक्र में बा-ख़ातिर-ए-यकसूमगर हम हैं कि असलन हिस नहीं हम को कोई इस कीहमारे पा-ए-हिम्मत इन मराहिल में हैं बे-क़ाबूजहाँ पहला क़दम रक्खा था रोज़-ए-अव्वलीं हम नेनहीं सरके इस अपने असली मरकज़ से ब-क़द्र-ए-मूये हालत है कि हम पर बंद है हर एक दरवाज़ानज़र आता नहीं हरगिज़ कोई उम्मीद का पहलूमगर वा-हसरता फिर भी हम अपने ज़ोम-ए-बातिल मेंसमझते हैं ज़माने भर से आगे ख़ुद को मंज़िल मेंज़रूरत है कि हम में रौशनी हो इल्म की पैदानज़र आए हमें भी ताकि अस्ल-ए-हालत-ए-दुनियाहमें मालूम हो हालात अब क्या हैं ज़माने केहमारे साथ का जो क़ाफ़िला था वो कहाँ पहुँचाजो पस्ती में थे अब वो जल्वा-गर हैं बाम-ए-रिफ़अत परजो बालक बे-निशाँ थे आज है इन का अलम बरपाहमारी ख़ूबियाँ सब दूसरों ने छीन लीं हम सेज़माने ने हमें इतना झिंझोड़ा कर दिया नंगारवा-दारी, उख़ुव्वत, दोस्ती, ईसार, हमदर्दीख़्याल-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत, दर्द-ए-क़ौम, अंदेशा-ए-फ़र्दाये सब जौहर हमारे थे कभी ऐ वाए-महरूमीबने हैं ख़ूबी-ए-क़िस्मत से जो अब ग़ैर का हिस्साअगर हो जाएँ राग़िब अब भी हम तालीम की जानिबतो कर सकते हैं अब भी मुल्क में हम ज़िंदगी पैदाबहुत कुछ वक़्त हम ने खो दिया है लेकिन इस पर भीअगर चाहें तो कर दें पेश-रौ को अपने हम पसपानिकम्मा कर दिया है काहिली ने गो हमें लेकिनरगों में है हमारी ख़ून अभी तक दौड़ता फिरताकोई मख़्फ़ी हरारत गर हमारे दिल को गरमा देहमारे जिस्म में फिर ज़िंदगी की रूह दौड़ा देवतन वालो बहुत ग़ाफ़िल रहे अब होश में आओउठो बे-दार हो अक़्ल-ओ-ख़िरद को काम में लाओतुम्हारे क़ौम के बच्चों में है तालीम का फ़ुक़्दाँये गुत्थी सख़्त पेचीदा है इस को जल्द सुलझाओयही बच्चे बिल-आख़िर तुम सभों के जा-नशीं होंगेतुम अपने सामने जैसा उन्हें चाहो बना जाओबहुत ही रंज-दह हो जाएगी उस वक़्त की ग़फ़लतकहीं ऐसा न हो मौक़ा निकल जाने पे पछताओये है कार-ए-अहम दो चार इस को कर नहीं सकतेख़ुदा-रा तुम भी अपने फ़र्ज़ का एहसास फ़रमाओये बोझ ऐसा नहीं जिस को उठा लें चार छे मिल करसहारा दो, सहारा दूसरों से इस में दिलवाओजो ज़ी-एहसास हैं हासिल करो तुम ख़िदमतें उन कीजो ज़ी-परवा हैं उन को जिस तरह हो उस तरफ़ लाओग़रज़ जैसे भी हो जिस शक्ल से भी हो ये लाज़िम हैतुम अपने क़ौम के बच्चों को अब तालीम दिलवाओअगर तुम मुस्तइ'द्दी को बना लोगे शिआर अपनायक़ीं जानो कि मुस्तक़बिल है बेहद शानदार अपनाख़ुदावंदा! दुआओं में हमारी हो असर पैदाशब-ए-ग़फ़लत हमारी फिर करे नूर-ए-सहर पैदाहमारे सारे ख़्वाबीदा क़वा बे-दार हो जाएँसर-ए-नौ हो फिर इन में ज़िंदगी की कर्र-ओ-फ़र्र पैदाहमें एहसास हो हम कौन थे और आज हम क्या हैंकरें माहौल-ए-मुल्की के लिए गहरी नज़र पैदामिला रक्खा है अपने जौहर-ए-कामिल को मिट्टी मेंहम अब भी ख़ाक से कर सकते हैं लाल-ओ-गुहर पैदाअगर चाहें तो हम मुश्किल वतन की दम में हल कर देंहज़ारों सूरतें कर सकते हैं हम कारगर पैदाब-ज़ाहिर गो हम इक तूदा हैं बिल्कुल राख का लेकिनअगर चाहें तो ख़ाकिस्तर से कर दें सौ शरर पैदावतन का नक्बत ओ अफ़्लास खो दें हम इशारे मेंजहाँ ठोकर लगा दें हो वहीं से कान-ए-ज़र पैदाहम इस मंज़िल के आख़िर पर पहुँच कर बिल-यक़ीं दम लेंअगर कुछ ताज़ा-दम हो जाएँ अपने हम-सफ़र पैदाजो कोशिश मुत्तहिद हो कर कहीं इक बार हो जाएयक़ीं है मुल्क की क़िस्मत का बेड़ा पार हो जाए
मामूरा-ए-एहसास में है हश्र सा बरपाइंसान की तज़लील गवारा नहीं होती
वो गूलर जिस पे मेरे ख़्वाब की परियों का डेरा थाफ़क़त आसेब लगता हैदिखाई कुछ नहीं देतालहू में शोर बरपा हैसुनाई कुछ नहीं देताजो दिल पर हाथ रक्खो तोफ़क़त इतना ही कहता है
मिरे दोस्तों में बहुत इश्तिराकी हैंजो हर मोहब्बत में मायूस हो करयूँही इक नए दौरा-ए-शादमानी की हसरत मेंकरते हैं दिल-जूई इक दूसरे कीऔर अब ऐसी बातों पे मैंज़ेर-ए-लब भी कभी मुस्कुराता नहीं हूँऔर उस शाम जश्न-ए-उरूसी मेंहुस्न ओ मय ओ रक़्स ओ नग़्मा के तूफ़ान बहते रहे थेफ़रंगी शराबें तो अन्क़ा थींलेकिन मय-ए-नाब-ए-क़ज़वीन ओ ख़ुल्लार-ए-शीराज़ के दौर-ए-पैहम सेरंगीं लिबासों सेख़ुश्बू की बे-बाक लहरों सेबे-साख़्ता क़हक़हों हमहमों सेमज़ामीर के ज़ेर-ओ-बम सेवो हंगामा बरपा थामहसूस होता थातेहरान की आख़िरी शब यही है!आचानक कहा मुर्सिदा ने:''तुम्हारा वो साथी कहाँ है?अभी एक सोफ़े पे देखा था मैं नेउसे सर-ब-ज़ानू!''तो हम कुछ परेशान से हो गएऔर कमरा-ब-कमरा उसे ढूँडने मिल के निकले!लो इक गोशा-ए-नीम-रौशन मेंवो इश्तिराकी ज़मीं पर पड़ा थाउसे हम बुलाया किए और झिंझोड़ा किएवो तो साकित था जामिद था!रूसी अदीबों की सर-चश्मा-गाहों की उस को ख़बर हो गई थी
नग़्मा-दर-जाँ रक़्स बरपा ख़ंदा-बर-लबदिल तमन्नाओं के बे-पायाँ अलाव के क़रीबदिल मिरे सहरा-नवर्द-ए-पीर दिलरेग के दिल-शाद शहरी रेग तूऔर रेग ही तेरी तलबरेग की निकहत तिरे पैकर में तेरी जाँ में हैरेग सुब्ह-ए-ईद के मानिंद ज़रताब-ओ-जलीलरेग सदियों का जमालजश्न-ए-आदम पर बिछड़ कर मिलने वालों का विसालशौक़ के लम्हात के मानिंद आज़ाद-ओ-अज़ीमरेग नग़्मा-ज़नकि ज़र्रे रेग-ज़ारों की वो पाज़ेब-ए-क़दीमजिस पे पड़ सकता नहीं दस्त-ए-लईमरेग-ए-सहरा ज़र-गरी की एक की लहरों से दूरचश्मा-ए-मक्र-ओ-रिया शहरों से दूररेग शब-बेदार है सुनती है हर जाबिर की चापरेग शब-बेदार है निगराँ है मानिंद-ए-नक़ीबदेखती है साया-ए-आमिर की चापरेग हर अय्यार ग़ारत-गर की मौतरेग इस्तिब्दाद के तुग़्याँ के शोर-ओ-शर की मौतरेग जब उठती है उड़ जाती है हर फ़ातेह की नींदरेग के नेज़ों से ज़ख़्मी सब शहंशाहों के ख़्वाबरेग ऐ सहरा की रेगमुझ को अपने जागते ज़र्रों के ख़्वाबों कीनई ताबीर देरेग के ज़र्रों उभरती सुब्ह तुमआओ सहरा की हदों तक आ गया रोज़-ए-तरबदिल मिरे सहरा-नवर्द-ए-पीर दिलआ चूम रेगहै ख़यालों के परी-ज़ादों से भी मासूम रेगरेग-ए-रक़्साँ माह-ओ-साल नूर तक रक़्साँ रहेउस का अबरेशम मुलाएम नर्म-ख़ू ख़ंदाँ रहेदिल मिरे सहरा-नवर्द-ए-पीर दिलये तमन्नाओं का बे-पायाँ अलावराह गुम कर दूँ की मशअ'ल इस के लब पर आओ आओतेरे माज़ी के ख़ज़फ़ रेज़ों से जागी है ये आगआग की क़ुर्मुज़ ज़बाँ पर इम्बिसात-ए-नौ के रागदिल मिरे सहरा-नवर्द-ए-पीर दिलसरगिरानी की शब-ए-रफ़्ता से जागकुछ शरर आग़ोश सरसर में हैं गुमऔर कुछ ज़ीना ब ज़ीना शो'लों के मीनार पर चढ़ते हुएऔर कुछ तह में अलाव की अभीमुज़्तरिब लेकिन मुज़बज़ब तिफ़्ल-ए-कम-सिन की तरहआग ज़ीना आग रंगों का ख़ज़ीनाआग उन लज़्ज़ात का सर-चश्मा हैजिस से लेता है ग़िज़ा उश्शाक़ के दिल का तपाकचोब-ए-ख़ुश्क अंगूर उस की मय है आगसरसराती है रगों में ईद के दिन की तरहआग काहिन याद से उतरी हुई सदियों की ये अफ़्साना-ख़्वाँआने वाले क़रनहा की दास्तानें लब पे हैंदिल मिरा सहरा-नवर्द-ए-पीर दिल सुन कर जवाँआग आज़ादी का दिल-शादी का नामआग पैदाइश का अफ़्ज़ाइश का नामआग के फूलों में नस्रीं यासमन सुम्बुल शफ़ीक़-ओ-नस्तरनआग आराइश का ज़ेबाइश का नामआग वो तक़्दीस धुल जाते हैं जिस से सब गुनाहआग इंसानों की पहली साँस के मानिंद इक ऐसा करमउम्र का इक तूल भी जिस का नहीं काफ़ी जवाबये तमन्नाओं का बे-पायाँ अलाव गर न होइस लक़-ओ-दक़ में निकल आएँ कहीं से भेड़ियेइस अलाव को सदा रौशन रखोरेग-ए-सहरा को बशारत हो कि ज़िंदा है अलावभेड़ियों की चाप तक आती नहींआग से सहरा का रिश्ता है क़दीमआग से सहरा के टेढ़े रेंगने वालेगिरह-आलूद ज़ोलीदा दरख़्तजागते हैं नग़्मा-दर-जाँ रक़्स बरपा ख़ंदा-बर-लबऔर मना लेते हैं तन्हाई में जश्न-ए-माहताबउन की शाख़ें ग़ैर-मरई तब्ल की आवाज़ पर देती हैं तालबीख़-ओ-बुन से आने लगती है ख़ुदावंदी जलाजिल की सदाआग से सहरा का रिश्ता है क़दीमरहरवों सहरा-नवर्दों के लिए है रहनुमाकारवानों का सहारा भी है आगऔर सहराओं की तन्हाई को कम करती है आगआग के चारों तरफ़ पश्मीना-ओ-दस्तार में लिपटे हुएअफ़्साना-गोजैसे गिर्द-ए-चश्म मिज़्गाँ का हुजूमउन के हैरत-नाक दिलकश तजरबों सेजब दमक उठती है रेतज़र्रा ज़र्रा बजने लगता है मिसाल-ए-साज़-ए-जाँगोश-बर-आवाज़ रहते हैं दरख़्तऔर हँस देते हैं अपनी आरिफ़ाना बे-नियाज़ी से कभीये तमन्नाओं का बे-पायाँ अलाव गर न होरेग अपनी ख़ल्वत-ए-बे-नूर-ओ-ख़ुद-बीं में रहेअपनी यकताई की तहसीं में रहेइस अलाव को सदा रौशन रखोये तमन्नाओं का बे-पायाँ अलाव गर न होएशिया अफ़्रीक़ा पहनाई का नामबे-कार पहनाई का नामयूरोप और अमरीका दाराई का नामतकरार-ए-दाराई का नाममेरा दिल सहरा-नवर्द-ए-पीर दिलजाग उठा है मश्रिक-ओ-मग़रिब की ऐसी यक-दिलीके कारवानों का नया रूया लिएयक-दिली ऐसी कि होगी फ़हम-ए-इंसाँ से वरायक-दिली ऐसी कि हम सब कह उठेंइस क़दर उजलत न करइज़्दिहाम-ए-गुल न बनकह उठें हमतू ग़म-ए-कुल तो न थीअब लज़्ज़त-ए-कुल भी न बनरोज़-ए-आसाइश की बेदर्दी न बनयक-दिली बन ऐसा सन्नाटा न बनजिस में ताबिस्ताँ की दो-पहरों कीबे-हासिल कसालत के सिवा कुछ भी न होइस जफ़ा-गर यक-दिली के कारवाँ यूँ आएँगेदस्त-ए-जादू-गर से जैसे फूट निकले हों तिलिस्मइश्क़-ए-हासिल-ख़ेज़ से या ज़ोर-ए-पैदाई से जैसे ना-गहाँखुल गए हों मश्रिक-ओ-मग़रिब के जिस्मजिस्म सदियों के अक़ीमकारवाँ फ़र्ख़न्दा-पय और उन का बारकीसा कीसा तख़्त-ए-जम और ताज-ए-कैकूज़ा कूज़ा फ़र्द की सतवत की मयजामा जामा रोज़-ओ-शब मेहनत का ख़यनग़्मा नग़्मा हुर्रियत की गर्म लयसालिको फ़िरोज़-बख़तो आने वाले क़ाफ़िलोशहर से लौटोगे तुम तो पाओगेरेत के सरहद पे जो रूह-ए-अबद ख़्वाबीदा थीजाग उठी है शिकवा-हा-ए-नै से वोरेत की तह में जो शर्मीली सहर रोईदा थीजाग उठी है हुर्रियत की लै से वोइतनी दोशीज़ा थी इतनी मर्द-ए-ना-दीदा थी सुब्हपूछ सकते थे न उस की उम्र हमदर्द से हँसती न थीज़र्रों की रानाई पे भी हँसती न थीएक महजूबाना बे-ख़बरी में हँस देती थी सुब्हअब मनाती है वो सहरा का जलालजैसे इज़्ज़-ओ-जल के पाँव की यही मेहराब होज़ेर-ए-मेहराब आ गई हो उस को बेदारी की रातख़ुद जनाब-ए-इज़्ज़-ओ-जल से जैसे उमीद-ए-ज़फ़ाफ़सारे ना-कर्दा गुनाह इस के मुआफ़सुब्ह-ए-सहरा शादबादऐ उरूस-ए-इज़्ज़-ओ-जल फ़र्ख़न्दा रो ताबिंदा खोतू इक ऐसे हुजरा-ए-शब से निकल कर आई हैदस्त-ए-क़ातिल ने बहाया था जहाँ हर सेज परसैंकड़ों तारों का रख़्शंदा लहू फूलों के पाससुब्ह-ए-सहरा सर मिरे ज़ानू पे रख कर दास्ताँउन तमन्ना के शहीदों की न कहउन की नीमा-रस उमंगों आरज़ूओं की न कहजिन से मिलने का कोई इम्काँ नहींशहद तेरा जिन को नश्श-ए-जाँ नहींआज भी कुछ दूर इस सहरा के पारदेव की दीवार के नीचे नसीमरोज़-ओ-शब चलती है मुबहम ख़ौफ़ से सहमी हुईजिस तरह शहरों की राहों पर यतीमनग़्मा-बर-लब ताकि उन की जाँ का सन्नाटा हो दूरआज भी इस रेग के ज़र्रों में हैंऐसे ज़र्रे आप ही अपने ग़नीमआज भी इस आग के शो'लों में हैंवो शरर जो उस की तह में पर-बुरीदा रह गएमिस्ल-ए-हर्फ़ ना-शुनीदा रह गएसुब्ह-ए-सहरा ऐ उरूस-ए-इज़्ज़-ओ-जलआ कि उन की दास्ताँ दोहराएँ हमउन की इज़्ज़त उन की अज़्मत गाएँ हमसुब्ह रेत और आग हम सब का जलालयक-दिली के कारवाँ उन का जमालआओइस तहलील के हल्क़े में हम मिल जाएँआओशाद-बाग़ अपनी तमन्नाओं का बे-पायाँ अलाव
मुसलमाँ क़र्ज़ ले कर ईद का सामाँ ख़रीदेंगेजो दाना हैं वो बेचेंगे जो हैं नादाँ ख़रीदेंगेजो सय्याँ शौक़ से खाएँ वो सिवय्याँ ख़रीदेंगेमुरक्कब सूद का सौदा ब-नक़्द-ए-जाँ ख़रीदेंगेमुसलामानों के सर पर जब मह-ए-शव्वाल आता हैतो उन की इक़तिसादियात में भौंचाल आता हैबहम दस्त-ओ-गरेबाँ सेल्ज़-मैन और उन के गाहक हैंवो ग़ुल बरपा है जैसे नग़्मा-ज़न जौहड़ में मेंडक हैंमिज़ाजन रोज़ा-दार-ए-शाम बारूद और गंधक हैंऔर उन में नज़्म और ज़ब्त और रवा-दारी यहाँ तक हैंकि शिद्दत भूक की और प्यास की ऐसे मिटाते हैंब-ज़ोम-ए-रोज़ा अबना-ए-वतन को काट खाते हैंजो मुझ ऐसे हैं रिंद उन को भी ज़ोम-ए-पारसाई हैऔर इस मज़मून की इक दावत-ए-इफ़्तार आई हैकि इक चालीस-साला तिफ़्ल की रोज़ा-कुशाई हैफ़रिश्ते इस पे हैराँ दम-ब-ख़ुद सारी ख़ुदाई हैख़ुदावंद-ए-दो-आलम से वो ये बेवपार करते हैंजो रक्खा ही नहीं रोज़ा उसे इफ़्तार करते हैंमियाँ बीवी चले बाज़ार को बहर-ए-ख़रीदारीमिठाई फल सिवय्याँ इत्र जूते गोश्त तरकारीजो शय बीवी ने ली वो दोश पर शौहर के दे मारीवो बे-चारा तो ख़च्चर है बराए बार-बरदारीब-ज़ोर-ए-क़र्ज़ दूकानों पे इतना फ़ज़्ल-ए-बारी हैकि इस घमसान में इंसान पर इंसान तारी हैलिया बीवी ने शौहर के लिए जूता जो अर्ज़ां हैवो अमरीकी मदद की तरह उस के सर पे एहसाँ हैकि इस से फ़ाएदा पहुँचेगा उस को जिस की दूकाँ हैऔर उस शौहर का जूता ख़ुद उसी के सर पे रक़्साँ हैये सूरत देख कर कहते हैं अक्सर दिल में बिन-ब्याहे''दिल ओ दीं नक़्द ला साक़ी से गर सौदा किया चाहे''जो सिलने को दिए कपड़े वो हैं सब हब्स-ए-बेजा मेंकि दर्ज़ी छुप गया जब अतलस-ओ-कमख़्वाब-ओ-दीबा मेंतो रेडीमेड कपड़ों की दुकानें झाँकता था मैंफ़लक पर क़ीमतें लटकी हुई थीं शाख़-ए-तूबा मेंमुबारक माह के अंदर हमीं से नफ़अ-ख़ोरी हैनहीं होता है बातिल जिस से रोज़ा ये वो चोरी हैये सिवय्याँ जो बल खाती हुई मेदे में जाएँगीसियासी गुत्थियों को और उलझाना सिखाएँगीहमारी आने वाली नस्ल के लीडर बनाएँगीजो लीडर बन चुके हैं एबडो उन को कराएँगी''क़द ओ गेसू में क़ैस-ओ-कोहकन की आज़माइश हैजहाँ हम हैं वहाँ दार-ओ-रसन की आज़माइश है''महीने भर के रोज़ों ब'अद हक़ ने दिन ये दिखलायाअलल-ऐलान खाया दोस्तों के साथ जो पायाये पहले डर था हम को झाँक कर देखे न हम-सायाब-जुज़ ख़ौफ़-ए-ख़ुदा दिन में ब-ज़ाहिर कुछ न था खायाहसीनों मह-वशों को अब सर-ए-बाज़ार देखेंगेगए वो दिन कि कहते थे पस-अज़-इफ़्तार देखेंगे
फ़र्ज़ करो कि सारे जानवर बात भी करते हम सेउन के जो जी में आ जाता कह देते एक दम सेदरवाज़े पर कुत्ता कहता भूके हैं दो दिन केकोई दवा भी दे दो देखो मक्खी ज़ख़्म पे भिनकेबावर्ची-ख़ाने में च्यूँटी शकर माँगती रहतीबस दो दाने बस दो दाने हर फेरे पर कहतीचिड़िया उड़ते फिरते खिड़की पर आवाज़ लगातीबच्चों के कमरे में छुप कर दाल के दाने खातीगए बैल सब्ज़ी के ठेले वालों से लड़ जातेडंडे खा कर गालियाँ बकते दिल की आग बुझातेबिल्ली दूध का प्याला पकड़े गोश्त माँगती रहतीदिन भर लेटी दादी जैसी अपनी बात ही कहतीबकरे की क़ुर्बानी पर कुछ बकरे मातम करतेमुर्ग़े भी इस मज्लिस में मुँह लटका कर ग़म करतेसास बहू के झगड़े की छिपकलियाँ शाहिद होतींशौहर की आमद पर सारा क़िस्सा वो ही रोतींग़रज़ के सारी दुनिया में इक शोर सा बरपा रहताचुप हो जाओ चुप हो जाओ सारा आलम कहता
नई जगह थी दूर दूर तक आख़िर पर दीवारें शब कीकुछ यारों ने बरपा कर दी इक महफ़िल कुछ अपने ढब कीऊँचे दर से दाख़िल हो कर साफ़ नशेब में बैठे जा करएक मक़ाम में हुए इकट्ठे रौनक़ और वीरानी आ करमरकज़-ए-दर से जश्न-बपा तक सैर थी शाम-ए-मेहर-ओ-वफ़ा कीख़ुशी थी उस से मिलने जैसी बेचैनी थी अब्र-ओ-हवा कीसब रंगों के लोग जम्अ थे एक ही मंज़िल थी उन सब कीइक बस्ती आलाम से ख़ाली एक फ़ज़ा किसी ख़्वाब-ए-तरब कीजंगल की शादाबी जैसा पहना था कोई जल्वा उस नेपैराहन इक नई वज़्अ का खुले समुंदर जैसा उस नेकर रक्खा था चेहरा अपना दुख-मुख से बे-परवा उस नेमेरी तरफ़ तकने से पहले चारों जानिब देखा उस ने
सर-ब-कफ़ हिन्द के जाँ-बाज़-ए-वतन लड़ते हैंतेग़-ए-नौ ले सफ़-ए-दुश्मन में घुसे पड़ते हैंएक खाते हैं तो दो मुँह पे वहीं जड़ते हैंहश्र कर देते हैं बरपा ये जहाँ अड़ते हैंजोश में आते हैं दरिया की रवानी की तरहख़ून दुश्मन का बहा देते हैं पानी की तरह
तुम्हारी आँख से टपका नहीं अब तक कोई आँसूमिरे चारों तरफ़ तूफ़ान बरपा है क़यामत कामिरी बेताब उम्मीदों को ठुकरा दो कि अपना लोतुम्हारे फ़ैसले पर फ़ैसला है मेरी क़िस्मत का
जून का तपता महीना तिम्तिमाता आफ़्ताबढल चुका है दिन के साँचे में जहन्नम का शबाबदोपहर इक आतिश-ए-सय्याल बरसाती हुईसीना-ए-कोहसार में लावा सा पिघलाती हुईवो झुलसती घास वो पगडंडियाँ पामाल सीनहर के लब ख़ुश्क से ज़र्रों की आँखें लाल सीचिलचिलाती धूप में मैदान को चढ़ता बुख़ारआह के मानिंद उठता हल्का हल्का सा ग़ुबारदेख वो मैदान में है इक बगूला बे-क़रारआँधियों की गोद में हो जैसे मुफ़लिस का मज़ारचाक पर जैसे बनाए जा रहे हों ज़लज़लेया जुनूँ तय कर रहा हो गर्दिशों के मरहलेढालना चाहे ज़मीं जिस तरह कोई आसमाँजैसे चक्कर खा के निकले तोप के मुँह से धुआँमिल रहा हो जिस तरह जोश-ए-बग़ावत को फ़राग़जंग छिड़ जाने पे जैसे एक लीडर का दिमाग़ख़शमगीं अबरू पे डाले ख़ाक-आलूदा नक़ाबजंगलों की राह से आए सफ़ीर-ए-इंक़लाबयूँ बगूले में हैं तपते सुर्ख़ ज़र्रे बे-क़रारजिस तरह अफ़्लास के दिल में बग़ावत के शरारकस क़दर आज़ाद है ये रूह-ए-सहरा ये भी देखकस तरह ज़र्रों में है तूफ़ान बरपा ये भी देखउठ बगूले की तरह मैदान में गाता निकलज़िंदगी की रूह हर ज़र्रे में दौड़ाता निकल
लेकिन इस दौर को क्या जानिए क्या रोग लगाअब तो महबूब की आमद भी नहीं हश्र से कमएक इक साँस में हैं कितने छनाके बरपा
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