aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "barsaato.n"
हम कि ठहरे अजनबी इतनी मुदारातों के बा'दफिर बनेंगे आश्ना कितनी मुलाक़ातों के बा'दकब नज़र में आएगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहारख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बा'दथे बहुत बेदर्द लम्हे ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ केथीं बहुत बे-मेहर सुब्हें मेहरबाँ रातों के बा'ददिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दीकुछ गिले शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बा'दउन से जो कहने गए थे 'फ़ैज़' जाँ सदक़े किएअन-कही ही रह गई वो बात सब बातों के बा'द
अब यही है तुझे मंज़ूर तो ऐ जान-ए-क़रारमैं तिरी राह न देखूँगा सियह रातों मेंढूँढ लेंगी मिरी तरसी हुई नज़रें तुझ कोनग़्मा ओ शेर की उमडी हुई बरसातों में
मज़दूर हैं हम, मज़दूर हैं हम, मजबूर थे हम, मजबूर हैं हमइंसानियत के सीने में रिसता हुआ इक नासूर हैं हमदौलत की आँखों का सुर्मा बनता है हमारी हड्डी सेमंदिर के दिए भी जलते हैं मज़दूर की पिघली चर्बी सेहम से बाज़ार की रौनक़ है, हम से चेहरों की लाली हैजलता है हमारे दिल का दिया दुनिया की सभा उजयाली हैदौलत की सेवा करते हैं ठुकराए हुए हम दौलत केमज़दूर हैं हम, मज़दूर हैं हम सौतेले बेटे क़िस्मत केसोने की चटाई तक भी नहीं, हम ज़ात के इतने हेटे हैंये सेजों पर सोने वाले शायद भगवान के बेटे हैंहम में नहीं कोई तब्दीली जाड़े की पाली रातों मेंबैसाख के तपते मौसम में, सावन की भरी बरसातों मेंकपड़े की ज़रूरत ही क्या है मज़दूरों को, हैवानों कोक्या बहस है, सर्दी गर्मी से लोहे के बने इंसानों कोहोने दो चराग़ाँ महलों में, क्या हम को अगर दीवाली हैमज़दूर हैं हम, मज़दूर हैं हम, मज़दूर की दुनिया काली हैमज़दूर के बच्चे तकते हैं जब हसरत से दूकानों कोमज़दूर का दिल देता है दुआ देवताओं को, भगवानों कोखाया मिट्टी के बर्तन में, सोए तो बिछौने को तरसेमुख़तारों पर तन्क़ीदें हैं, बे-चारगियाँ मजबूरों कीसूखा चेहरा दहक़ानों का, ज़ख़्मी पीठें मज़दूरों कीवो भूखों के अन-दाता हैं, हक़ उन का है बे-दाद करेंहम किस दरवाज़े पर जाएँ किस से जा कर फ़रियाद करेंबाज़ार-ए-तमद्दुन भी उन का दुनिया-ए-सियासत भी उन कीमज़हब का इरादा भी उन का, दुनिया-ए-सियासत भी उन कीपाबंद हमें करने के लिए सौ राहें निकाली जाती हैंक़ानून बनाए जाते हैं, ज़ंजीरें ढाली जाती हैंफिर भी आग़ाज़ की शोख़ी में अंजाम दिखाई देता हैहम चुप हैं लेकिन फ़ितरत का इंसाफ़ दुहाई देता है
बिछड़ते वक़्तउस ने कहा थासुनो तुम मुझे याद आओगीजब कभीसाहिल समुंदर परनंगे पाँव चलते हुएसमुंदर की आग़ोश मेंडूबते सूरज के मंज़र का पीला-पनआँखों में उतरेगातुम मुझे याद आओगीजब कभीबरसातों की अँधेरी रातों मेंदिल के किसी गोशे मेंइक हल्की सी आहट पा करयादें गहरी नींद से जागेंगीतुम मुझे याद आओगीजब कभी ज़ीस्त के किसी मोड़ परकिसी ग़म-गुसार किसी जाँ-निसार सेकुछ कहने सुनने का मन चाहेगाजब कभीदिल ये चाहेगा किकिसी हमदम किसी महबूब की चाहत में इस दुनिया को छोड़ देतुम मुझे याद आओगीजब कभी सर्दियों की शामों मेंये ख़्वाहिश दर-दिल पे दस्तक देगी किसाथ इक साथी होजिस की बातों में जिस की साँसों मेंइक अनोखी गर्मी होचाहतों की हिद्दत होतुम मुझे याद आओगीइस से मैं उस से क्या कहतीमा-सिवाए इस के कितुम्हें याद आने के लिएकिसी हवाले किसी मौसम किसी मंज़र की हाजत कीकिसी भी वास्ते की ज़रूरत नहींदिल की धड़कन हर घड़ी हर पलसाथ चलती हैसाथ रहती हैऔर तुम मेरे दिल की धड़कन होजो चाह कर भी रुक नहीं सकतीमैं तुम को भूल नहीं सकती
अजनबी आँखों में मानूस वफ़ाओं का चराग़एक उम्मीद पे जलता रहा घुप रातों मेंजिस्म मिट्टी की तरह घुलता रहा पानी मेंरंग बे-रंग हुए जाते थे बरसातों में
ऊँचे मकानों की दीवारों पर हरी भरी फूलों की बेलसुरमई बादलों के घुँघट से मेरी छोटी खिड़की की तरफ़देखती हैप्रसुएडर्स टीवी पर फ़िल्म चल रही हैमैं किस के तआ'क़ुब में अपनी तरफ़ भाग रही हूँमैं कोल्हू का बैल हूँरोज़ एक दायरा अपने इर्द-गिर्द खींचती हूँ और इस दाएरेके आगे एक और दायरा फिर एक औरयूँ आगे ही आगे दाएरे ही दाएरेज़िंदगी का सफ़र दाएरों से लिखा गयासुबह दोपहर शाम आँसू की रोटी दुख का सालन औरसर्द आहों का पानीबरसातों की शामें निर्मल कोमल दिल को यूँ दहलाती हैंजैसे आतिश-दान की क़रीब सोई बिल्ली अन-जाने क़दमों से चौंक जाएये भी एक दायरा हैइस दाएरे के अंदर हमारे हथियार ज़मीन पर पड़ते हैंऔर हम हाथ उठाए आसमानी आवाज़ परआगे ही आगे बे-सम्त चलते जा रहे हैंदाएरे बनते जा रहे हैं
मेरे घर की ये दीवारें जैसे पी कर बैठी हैंमेरे जलते जलते आँसू मेरे लहू की बरसातों कोमेरी तन्हाई के अंधेरे में आ आ कर हँसते हैंनन्हे नन्हे कितने जुगनू मेरी भीगी पलकों केबुझे दिये की लौ रह रह कर आधी आधी रातों कोअपनी गहरी नींद से जैसे चौंक उठती है बोल उठती हैआशाओं के सुंदर मुखड़े पर लाली सी आ जाती हैमुरझाए से नील-कँवल का और भी रूप निखर आता हैधीरे धीरे शीतल जल की लहरें साज़ उठाती हैंगीतों की निर्मल धारा पर डोल उठती है जीवन-नय्याहौले हौले बहती जाए बहती जाए चलती जाएसमय की नद्दी वो नद्दी है जो हर इक को पार लगाएनद्दी के उस पार खड़े हैं मेरे बच्चे मेरे बालेमेरे खेतों के सब मोती मेरे ख़ज़ाने के रखवालेमेरी तरफ़ सब हाथ उठा कर जैसे ख़ुशी से चिल्लाते हैंआओ आओ कितनी देर से राह तुम्हारी देख रहे हैंतुम को आज के दिन सूरज की किरनों में नहलाएँगेआज हम अपनी सालगिरह का पहला जश्न मनाएँगे
दीवारों की रंगत बदलीईंटों की दर्ज़ों मेंघास उग आईआँगन मेंमलबे के ढेर पड़े हैंजो इन महल-नुमा दीवारों परलेटेजाने किन किन पर साया करते हैंमौसम की तब्दीली परख़ुश होते हैंबरसातों में नहा लेते हैंअब ये खंडरों की शक्लों मेंबदल गए हैंअब इन की नीलामी होगीऔर खुदेंगीनई ता’मीरों कीबुनियादें
चमकते चाँद की बातेंये बूँदें और बरसातें
साँस लेना भी कैसी आदत हैजिए जाना भी क्या रिवायत हैकोई आहट नहीं बदन में कहींकोई साया नहीं है आँखों मेंपाँव बेहिस हैं चलते जाते हैंइक सफ़र है जो बहता रहता हैकितने बरसों से कितनी सदियों सेजिए जाते हैं जिए जाते हैं
कुछ रंग है गुज़रे लम्हों काकुछ अश्कों की बारातें हैं
तुझ से बिछड़ कर भी ज़िंदा थामर मर कर ये ज़हर पिया हैचुप रहना आसान नहीं थाबरसों दिल का ख़ून किया हैजो कुछ गुज़री जैसी गुज़रीतुझ को कब इल्ज़ाम दिया हैअपने हाल पे ख़ुद रोया हूँख़ुद ही अपना चाक सिया हैकितनी जाँकाही से मैं नेतुझ को दिल से महव किया हैसन्नाटे की झील में तू नेफिर क्यूँ पत्थर फेंक दिया है
ये मिलें ये जागीरेंकिस का ख़ून पीती हैंबैरकों में ये फ़ौजेंकिस के बल पे जीती हैंकिस की मेहनतों का फलदाश्ताएँ खाती हैंझोंपड़ों से रोने कीक्यूँ सदाएँ आती हैंजब शबाब पर आ करखेत लहलहाता हैकिस के नैन रोते हैंकौन मुस्कुराता हैकाश तुम कभी समझोकाश तुम कभी समझोकाश तुम कभी जानोदस करोड़ इंसानो!इल्म-ओ-फ़न के रस्ते मेंलाठियों की ये बाड़ेंकॉलिजों के लड़कों परगोलियों की बौछाड़ेंये किराए के गुंडेयादगार-ए-शब देखोकिस क़दर भयानक हैज़ुल्म का ये ढब देखोरक़्स-ए-आतिश-ओ-आहनदेखते ही जाओगेदेखते ही जाओगेहोश में न आओगेहोश में न आओगेऐ ख़मोश तूफ़ानो!दस करोड़ इंसानो!
ये सरगोशियाँ कह रही हैं अब आओ कि बरसों से तुम को बुलाते बुलाते मिरेदिल पे गहरी थकन छा रही हैकभी एक पल को कभी एक अर्सा सदाएँ सुनी हैं मगर ये अनोखी निदा आ रही हैबुलाते बुलाते तो कोई न अब तक थका है न आइंदा शायद थकेगामिरे प्यारे बच्चे मुझे तुम से कितनी मोहब्बत है देखो अगरयूँ किया तोबुरा मुझ से बढ़ कर न कोई भी होगा ख़ुदाया ख़ुदायाकभी एक सिसकी कभी इक तबस्सुम कभी सिर्फ़ तेवरीमगर ये सदाएँ तो आती रही हैंइन्ही से हयात-ए-दो-रोज़ा अबद से मिली हैमगर ये अनोखी निदा जिस पे गहरी थकन छा रही हैये हर इक सदा को मिटाने की धमकी दिए जा रही है
जिन शहरों में गूँजी थी ग़ालिब की नवा बरसोंउन शहरों में अब उर्दू बेनाम-ओ-निशाँ ठहरीआज़ादी-ए-कामिल का एलान हुआ जिस दिनमा'तूब ज़बाँ ठहरी ग़द्दार ज़बाँ ठहरी
गुलाब चेहरे पे मुस्कुराहटचमकती आँखों में शोख़ जज़्बेवो जब भी कॉलेज की सीढ़ियों सेसहेलियों को लिए उतरतीतो ऐसे लगता था जैसे दिल में उतर रही होकुछ इस तयक़्क़ुन से बात करती थी जैसे दुनियाउसी की आँखों से देखती होवो अपने रस्ते में दिल बिछाती हुई निगाहों से हँस के कहतीतुम्हारे जैसे बहुत से लड़कों से मैं ये बातेंबहुत से बरसों से सुन रही हूँमैं साहिलों की हवा हूँ नीले समुंदरों के लिए बनी हूँवो साहिलों की हवा सी लड़कीजो राह चलती तो ऐसे लगता था जैसे दिल में उतर रही होवो कल मिली तो उसी तरह थीचमकती आँखों में शोख़ जज़्बे गुलाब चेहरे पे मुस्कुराहटकि जैसे चाँदी पिघल रही होमगर जो बोली तो उस के लहजे में वो थकन थीकि जैसे सदियों से दश्त-ए-ज़ुल्मत में चल रही हो
ओ देस से आने वाले बताक्या अब भी शफ़क़ के सायों मेंदिन रात के दामन मिलते हैंक्या अब भी चमन में वैसे हीख़ुश-रंग शगूफ़े खिलते हैंबरसाती हवा की लहरों सेभीगे हुए पौदे हिलते हैंओ देस से आने वाले बता
तू आग में ऐ औरत ज़िंदा भी जली बरसोंसाँचे में हर इक ग़म के चुप-चाप ढली बरसोंतुझ को कभी जलवाया तुझ को कभी गड़वायाबाज़ार है वो अब तक जिस में तुझे नचवाया
बरसों की बात है कि मिरे जी में आई थीमैं सोचता था तुझ से कहूँ, छोड़ क्या कहूँअब कौन उन शिकस्ता मज़ारों की बात लाएमाज़ी पे अपने हाल को तरजीह क्यूँ न दूँमातम ख़िज़ाँ का हो कि बहारों का, एक हैशायद न फिर मिले तिरी आँखों का ये फ़ुसूँ
ये मस्त मस्त घटा, ये भरी भरी बरसाततमाम हद्द-ए-नज़र तक घुलावटों का समाँफ़ज़ा-ए-शाम में डोरे से पड़ते जाते हैंजिधर निगाह करें कुछ धुआँ सा उठता हैदहक उठा है तरावत की आँच से आकाशज़े-फ़र्श ता-फ़लक अंगड़ाइयों का आलम हैये मद-भरी हुई पुरवाइयाँ सनकती हुईझिंझोड़ती है हरी डालियों को सर्द हवा
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