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नज़्म
कब नज़र में आएगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहार
ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बा'द
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
हम में नहीं कोई तब्दीली जाड़े की पाली रातों में
बैसाख के तपते मौसम में, सावन की भरी बरसातों में
जमील मज़हरी
नज़्म
शाइस्ता हबीब
नज़्म
मेरे घर की ये दीवारें जैसे पी कर बैठी हैं
मेरे जलते जलते आँसू मेरे लहू की बरसातों को
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
नज़्म
ये सरगोशियाँ कह रही हैं अब आओ कि बरसों से तुम को बुलाते बुलाते मिरे
दिल पे गहरी थकन छा रही है
मीराजी
नज़्म
जिन शहरों में गूँजी थी ग़ालिब की नवा बरसों
उन शहरों में अब उर्दू बेनाम-ओ-निशाँ ठहरी