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नज़्म
ये सरगोशियाँ कह रही हैं अब आओ कि बरसों से तुम को बुलाते बुलाते मिरे
दिल पे गहरी थकन छा रही है
मीराजी
नज़्म
जिन शहरों में गूँजी थी ग़ालिब की नवा बरसों
उन शहरों में अब उर्दू बेनाम-ओ-निशाँ ठहरी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
कभी ग़नीम-ए-जौर-ओ-सितम के हाथों खाई ऐसी मात
अर्ज़-ए-अलम में ख़्वार हुए हम बिगड़े रहे बरसों हालात
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
ये कहते हैं कि अब अरमाँ निकालो अपने बरसों के
तुम्हारे सामने फैला हुआ मैदान सारा है