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नज़्म
है अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद
कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
यही घटाएँ यही बर्क़-ओ-र'अद ओ क़ौस-ए-क़ुज़ह
यहीं के गीत रिवायात मौसमों के जुलूस
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
जिस ने हर दाम में आने में तकल्लुफ़ बरता
ले उड़ी है उसे ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर अब के
साहिर लुधियानवी
नज़्म
मुज़्दा ऐ दोस्त कि वो जान-ए-बहार आ पहुँचा!
अपने दामन में लिए बर्क़-ओ-शरार आ पहुँचा!
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
सर-ज़मीन-ए-हिंद का ये बाज़ू-ए-शमशीर-ज़न
जिस के मरदान-ए-जरी हैं शो'ला-बार-ओ-सफ़-शिकन
अर्श मलसियानी
नज़्म
वो जिन में मुल्क-ए-बर्क़-ओ-बाद तक तस्ख़ीर होता है
जहाँ इक शब में सोने का महल तामीर होता है