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नज़्म
रहा दिल-बस्ता-ए-महफ़िल मगर अपनी निगाहों को
किया बैरून-ए-महफ़िल से न हैरत-आश्ना तू ने
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
कभी झीलों के पानी में कभी बस्ती की गलियों में
कभी कुछ नीम उर्यां कमसिनों की रंगरलियों में