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नज़्म
कोई पूछे क़द्र उन से जो यहाँ महरूम हैं
वो समझते हैं बताएँगे कि क्या हैं बेटियाँ
रूबीना मुमताज़ रूबी
नज़्म
आज अपने हर हम-जोली को हम उल्लू ख़ूब बनाएँगे
अमजद चूनी और तुलसी को दावत पे बुलाया जाएगा
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
तुम मसीहा हो कि क़ातिल हो मैं क्यों बतलाऊँ
ख़ुद ये तारीख़ के औराक़ बताएँगे तुम्हें
पयाम फ़तेहपुरी
नज़्म
नादिम नदीम
नज़्म
हबीब जालिब
नज़्म
हम कि ठहरे अजनबी इतनी मुदारातों के बा'द
फिर बनेंगे आश्ना कितनी मुलाक़ातों के बा'द
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
गरचे मिल-बैठेंगे हम तुम तो मुलाक़ात के बा'द
अपना एहसास-ए-ज़ियाँ और ज़ियादा होगा