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नज़्म
दिल के हर क़तरे में तूफ़ान-ए-तजल्ली भर दे
बत्न-ए-हर-ज़र्रा से इक महर-ए-मुबीं पैदा कर
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
समेट लूँ उन्हें तो फिर वो काएनात को जगाएँ
अभी तो रूह बन के ज़र्रे ज़र्रे में समाऊँगा
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
न इस का कोई मस्लक है न इस का कोई मज़हब है
दिल-ए-हर्स-ओ-हवस में बन के रहती है ये चिंगारी
रहबर जौनपूरी
नज़्म
जो आता था सो वो हो रहता था उसी घर का
ज़मीं की नाफ़ है का'बा है बत्न-ए-मादर का
मोहम्मद अली तिशना
नज़्म
हौसला रख मुंतज़िर रह मौसम-ए-गर्मा का फिर
बैन मत कर अब दिल-ए-नाकाम रुख़्सत हो गया
शाहीन इक़बाल असर
नज़्म
अमीर औरंगाबादी
नज़्म
बत्न-ए-ख़ुर्शीद से आग के सुर्ख़ धब्बे की सूरत निकल कर
ख़ला के अँधेरे समुंदर में डूबी